एक ही विषयवस्तु ( कभी- कभी भोलेपन में हुआ अपराध भी जिंदगी बना देता है) पर बनीं दो फिल्में। एक महा- उबाऊ पर समीक्षकों की कृपा से हुई हिट, दूसरी फिल्म बेहतरीन, पर समीक्षकों की उपेक्षा से हुई गायब।

“कमीने” उस श्रेणी की फिल्म है जिसे हम “ऑस्कर फिल्म” कहते हैं। कलात्मक, प्रयोगधर्मी, सिरदर्दिया, अंधेरे में फिल्माई गई, इतनी धीमी कि घड़ी की जगह कैलेण्डर देखने को दिल चाहे। अर्थात- फिल्म समीक्षकों की अति प्रिय, पांच में चार सितारा पाने वाली फिल्म।

दूसरी फिल्म “संकट सिटी”, जो प्रयोगधर्मी नाम के बावजूद हास्य से भरपूर, महा- तेज रफ्तार और के के मेनन और दिलीप प्रभावलकर के अनुपम अभिनय से जीवंत। घटनाक्रम इतनी तेजी से घूमता रहता है कि आपका सिर घूम जाए और जब तक आप संवाद पर दिल खोल कर हंसे, दृश्य बदल जाए। और सस्पेंस इस तरह आपको लपेट ले कि यह भूल कर कि आप सिनेमाघर में हैं आप मुख्य पात्रों पर पल-पल आ रही आपदा पर ऎसे सीट से उछलें जैसे आप भी पर्दे पर जी रहे हों।
क्या आपने देखी थीं ये दो फिल्में? क्या राय है आपकी इस बारे में?