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कैसे मिलेगी पैसों की आजादी, वित्तीय साक्षरता की ओर पहला कदम

प्रकाशित Sat, 15, 2015 पर 14:03  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

15 अगस्त 1947 को देश राजनीतिक तौर पर आजाद हो गया। लेकिन देश के लाखो करोड़ों लोगों के लिए आर्थिक आजादी की जद्दोजहद आज भी जारी है। ये लोग अब भी बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर से बाहर हैं। ये लोग या तो साहूकारों के चंगुल में फंसकर कर्ज के मकड़जाल में फंस जाते हैं या फिर ज्यादा लाभ के लालच में गैरकानूनी स्कीम्स में फंसकर अपनी पसीने की गाढ़ी कमाई गंवा बैठते हैं। इनकी मुक्ति फाइनेंशियल इनक्लूजन के बिना नहीं हो सकती।


फाइनेंशियल इन्कलूजन से मतलब देश के उन करोड़ों लोगों को वित्तीय सेवाओं, बचत और निवेश की प्रक्रिया से जोड़ने से है जो किसी वजह से इससे बाहर रह गए हैं। बैंकिंग सेक्टर के रेगुलेशन के साथ-साथ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया देश में फाइनेंशियल इन्कलूजन की मुहिम भी चला रहा है। आरबीआई का जोर कमजोर तबके और कम आमदनी वाले समूहों को इसके दायरे में लाने पर है।


फाइनेंशियल सेवाओं के दायरे से बाहर खड़े करोड़ों लोगों का फाइनेंशिंयल इनक्लूजन बिना फाइनेंशियल लिटरेसी के नहीं हो सकता। फाइनेंशियल लिटरेसी की इस मुहिम में डिजिटल टेक्नोलॉजी बेहद असरदार भूमिका निभा सकती है। टेलिविजन, रेडियो, इंटरनेट और मोबाइल के जरिए इस काम को बखूबी अंजाम दिया जा सकता है। देश के पहले हिंदी बिजनेस न्यूज चैनल के नाते सीएनबीसी-आवाज ने 15 अगस्त से ये बीड़ा उठाया है। सीएनबीसी-आवाज इस दिन फाइनेंशियल फ्रीडम डे के तौर पर मनाना चाहता है। अगले एक साल तक सीएनबीसी-आवाज का लक्ष्य छोटे शहरों और गांवों में रहने वाले लाखों करोड़ों लोगों को बैंकिंग, बचत और निवेश की बारहखड़ी सीखाना है।


बैंकिंग सेवाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ाने के मकसद से मोदी सरकार ने पहल की और एक साल में ही प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत करीब 14 करोड़ नए बैंक खाते खुल चुके हैं। इन खातों में 12,500 करोड़ रुपये से ज्यादा राशि जमा हो चुकी है। लेकिन इस मुहिम को शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी।


2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 24 करोड़ 67 लाख परिवारों में से केवल 14 करोड़ 78 लाख यानि 58.70 फीसदी परिवार ही अब तक बैकिंग सेवाओं से जुड़ पाए थे। 2012 में वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी के मुताबिक केवल 35 फीसदी के पास ही बैंक खाते थे और इनमें से केवल 8 फीसदी लोगों ने ही बैंक से पैसा कर्ज लिया।


भारत में बैंकिंग और दूसरी फाइनेंशियल सेवाओं की पहुंच आखिर इतनी कम क्यों है। जवाब 2013 में की गई इस स्टडी में मिल सकता है। 2013 में की गई एक स्टडी के मुताबिक फाइनेंशियल लिटरेसी यानि बैंकिंग, बचत और निवेश की जानकारी के मामले में भारत एशिया-पैसिफिक इलाके के 16 देशों में आखिरी पायदान पर है। स्टडी 18 से 64 साल की उम्र के लोगों के बीच की गई थी। यानि फाइनेंशियल लिटरेसी की कमी बैंकिंग सेवाओं के विस्तार की राह में एक बड़ा रोड़ा है।


जब बुनियादी बैंकिंग सेवाओं को लेकर जानकारी का इतना अभाव हो तो म्युचुअल फंड्स जैसे बचत और निवेश की योजनाओं की जानकारी को लेकर अंदाजा लगाया जा सकता है। 2013 के ही आंकड़े बताते हैं कि भारत में 10 फीसदी से भी कम परिवार अपनी बचत का निवेश म्युचुअल फंड्स में करते हैं। इनमें भी 40 फीसदी म्युचुअल फंड निवेशक 4-5 मेट्रो शहरों से आते हैं। देश में म्युचुअल फंड इंडस्ट्री की ग्रोथ भी दुनिया की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले काफी कम है। मसलन भारत में म्युचुअल फंड इंडस्ट्री की ग्रोथ 15 फीसदी सालाना से कम है जबकि ब्राजील में ये 40 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका में 33 फीसदी सालाना है।


इससे भी बुरा हाल स्टॉक मार्केट में निवेश का है। एक आंकड़े के मुताबिक 2011 तक भारत में करीब 2 फीसदी परिवार अपनी बचत को शेयर बाजार में निवेश करते थे। इनमें 80 फीसदी निवेशक देश के 10 बड़े शहरों से हैं। पिछले चार साल में भी इस स्थिति में खास सुधार नहीं आया है। ये आंकड़े बताते हैं कि म्युचुअल फंड्स और इक्विटी मार्केट को लेकर छोटे शहरों और गांवों में जानकारी का अभाव है।


निवेश को लेकर जो थोड़ी बहुत जानकारी है वो परंपरागत फिक्स्ड डिपॉजिट और लाइफ इंश्योरेंस तक ही सीमित है। ऐसे में फाइनेंशियल लिटरेसी एक बड़ा रोल निभा सकती है। इसलिए सीएनबीसी-आवाज़ ने ठाना है कि एक्सपर्ट की मदद से देश के दूर दराज हिस्सों के करोड़ों लोगों को बचत और निवेश की बारिकियों से वाकिफ करवाएगा।


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