आवाज़ अड्डा: ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों में कितना दम! -
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आवाज़ अड्डा: ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों में कितना दम!

प्रकाशित Wed, 12, 2017 पर 11:08  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

5 राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर जो विवाद शुरू हुआ, वो थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले मायावती और अरविंद केजरीवाल सवाल उठाए। और अब 16 विपक्षी पार्टियां साथ मिलकर चुनाव आयोग के पास पहुंच गई हैं। इनका आरोप है कि ईवीएम मशीनों पर राजनीतिक दलों और जनता के मन में तरह-तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। अलग अलग जगहों से ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतें मिल रही हैं। यही नहीं उनकी मांग है कि अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जो चुनाव होनेवाले हैं वहां इन मशीनों की जगह बैलट पेपर ही इस्तेमाल किए जाएं। चुनाव आयोग ने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक का भरोसा दिलाया है। इसी मुद्दे पर कल मायावती की पार्टी बीएसपी ने यूपी में काला दिवस मनाया। सवाल है कि क्या वाकई ईवीएम मशीनें भरोसा खो रही हैं, क्या विपक्ष के आरोपों में वाकई दम है या ये सिर्फ अपनी हार का ठीकरा मशीनों पर फोड़ रहे हैं और अगर बैलट पेपर की मांग मान ली जाती है तो क्या धांधली की कोई आशंका नहीं रह जाएगी। आवाज़ अड्डा में आज इसी मुद्दे पर बात होगी।


बता दें कि वीवीपीएटी वाली ईवीएम मशीन में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। इन पर कमल के निशान वाली पर्ची ही निकलने के आरोप हैं। चुनाव आयोग ने गड़बड़ी के आरोपों का खंडन किया। कुछ अखबारों की ओर से गलत रिपोर्टिंग के आरोप भी आए। 9 अप्रैल को धौलपुर में हुए उपचुनाव में 18 मशीनों में गड़बड़ी के आरोप लगे। यहां कांग्रेस को वोट देने पर कमल को वोट जाने की शिकायतें मिली। चुनाव आयोग ने आरोपों का खंडन किया और अपने बयान में कहा कि कुछ मशीनों में गड़बड़ी की वजह से वोट दर्ज नहीं हुए। किसी दूसरी पार्टी को वोट जाने की खबरें निराधार हैं।


ईवीएम में गड़बड़ी नहीं होने की दलील देते हुए चुनाव आयोग का कहना है कि ईवीएम किसी तरह इंटरनेट, सर्वर से कनेक्ट नहीं है। ईवीएम की ऑनलाइन हैकिंग नहीं की जा सकती। वोटिंग शुरू होने से पहले ईवीएम की टेस्टिंग होती है। मॉक पोलिंग में सभी पोलिंग एजेंट से वोट डलवाए जाते हैं। एजेंट देखते हैं कि उनके उम्मीदवार के पक्ष में वोट डल रहे हैं। पोलिंग एजेंट ईवीएम सही होने का सर्टिफिकेट प्रभारी को देते हैं। मॉक पोलिंग के बाद ही वोटिंग शुरू की जाती है। हर पोलिंग बूथ में वोटरों की डिटेल रजिस्टर में लिखी जाती है। ईवीएम के वोटों का मिलान रजिस्टर से किया जाता है।


बता दें कि बीजेपी भी ईवीएम पर सवाल उठा चुकी है। 2009 में लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे। उन्होंने लोकसभा चुनावों में हार के बाद ईवीएम पर संदेह जताया था। आडवाणी ने परंपरागत मतपत्रों की वापसी की मांग की थी। जी वी एल नरसिम्हा राव ने ईवीएम में गड़बड़ी पर किताब भी लिखी है। किताब का नाम डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन था। इस किताब की भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी है। किताब में ईवीएम से धोखाधड़ी पर विस्तार से चर्चा की गई है। सुब्रमणियन स्वामी तो ईवीएम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक गए।


बता दें कि पारदर्शिता में कमी के चलते नीदरलैंड में ईवीएम को बैन कर दिया गया। 3 साल के रिसर्च के बाद आयरलैंड में भी ईवीएम को बैन कर दिया गया। ईवीएम को असंवैधानिक बताते हुए जर्मनी ने बैन किया हुआ है। इटली में भी ईवीएम बैन हो चुकी है वहीं अमेरिका के कई राज्यों में ईवीएम पर बैन है।


भारत में ईवीएम के सफर की बात करें तो 1998 में देश में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल शुरू हुआ। 16 विधानसभा क्षेत्रों में से इसकी शुरुआत हुई थी। 1999 में लोकसभा चुनाव में कुछ सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था। 2004 से सभी चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है। बता दें कि एक ईवीएम में 3840 वोट दर्ज हो सकते हैं।