सरकार भरोसे खेती, क्यों बदहाल है किसान! -
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सरकार भरोसे खेती, क्यों बदहाल है किसान!

प्रकाशित Fri, 09, 2017 पर 17:01  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

देश के किसान आज सड़क पर हैं और खेती की हालत बेहद खराब है। रिकॉर्ड पैदावार है, लेकिन भाव नहीं मिल रहा। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब और अब चेन्नई के किसान अंदोलन कर रहे हैं लेकिन आज हम पिछले दिनों के घटनाक्रम पर नहीं बल्कि इस बात पर चर्चा करने वाले हैं कि सरकार के इस दावे कि उसकी कोशिशों से किसान ज्यादा खेती कर रहे हैं, देश का किसान खुश क्यो नहीं हैं।


सबसे बडा सवाल ये है कि सरकार इन्हें दाम क्यों नहीं दिला पा रही। जरा आंकड़ों पर गौर करें। 3 साल में धान का एमएसपी 12 फीसदी बढ़ा, लेकिन बाजार भाव एमएसपी के नीचे। अरहर तो एमएसपी से 1000 रुपये नीचे है। सोयाबीन का भाव 5 साल के निचले स्तर पर है। सरसों और गेहूं में भी लागत निकालना संभव नहीं। क्यों नहीं मिल पा रहा है किसानों को उनकी उपज का दाम, किस काम का है ये एमएसपी और सरकार की क्या है खेती में भूमिका।


देश का किसान परेशान है क्योंकि फसलों का भाव नहीं मिल रहा है। ज्यादातर फसलें पिछले 3-5 साल के निचले स्तर पर हैं। सोयाबीन, सरसों, दाल और गेहूं एमएसपी के नीचे हैं। नवंबर से सब्जियों के भाव जमीन पर आ गए हैं। सिंचाई और बिजली की भी पर्याप्त सुविधा नहीं मिल पा रही है। किसानों के लिए बाजार की उचित व्यवस्था अभाव है।


जब अनाज के भाव गिर रहे हैं, तब सरकार की ओर से इंपोर्ट पर पाबंदी, एक्सपोर्ट को बढ़ावा और स्टॉक लिमिट में छूट जैसे कदम उठाए जाते हैं। वहीं महंगाई बढ़ने पर सरकार की ओर से एक्सपोर्ट पर पाबंदी, आसानी इंपोर्ट और स्टॉक लिमिट लगाने जैसे कदम उठाती है। दरअसल राज्य और केंद्र में तालमेल नहीं है, इसके साथ ही फैसले लेने में देरी हो रही है। मार्केट इंटेलिजेंस की कमी है और खेती की पारदर्शी नीतियां नहीं हैं। सरकार की पॉलिसी कारोबारियों के पक्ष में ज्यादा है। सरकार का खेती की लागत घटाने पर जोर नहीं है। सरकार सिर्फ एमएसपी से किसानों को खुश करने की कोशिश करती है।


खेती की तस्वीर पर एक नजर डालें तो साल 2010 के बाद से देश में अनाज पैदावार 25 फीसदी बढ़कर 27.3 करोड़ टन रहा है। गेहूं, दाल और सोयाबीन की रिकॉर्ड पैदावार देखने को मिली है। अगले साल भी देश में रिकॉर्ड पैदावार का अनुमान है। हालांकि खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। प्रमुख 8 में से 6 फसलों के दाम एमएसपी के नीचे हैं, जबकि नवंबर के बाद से सब्जियों की कीमत जमीन पर आ गई है। 5 साल में अनाज पैदावार करीब 25 फीसदी बढ़ा, लेकिन भाव में औसत 20 फीसदी की बढ़त देखने को मिली है। सोयाबीन का भाव 5 साल के निचले स्तर पर आ गया है। सरसों का भाव 2.5 साल के निचले स्तर पर आ गया है। गेहूं का भाव 1 साल के निचले स्तर पर आ गया है।


अब बताते हैं कि ये एमएसपी क्या है, एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकार इस भाव पर बाजार में दखल देती है। कीमतों में ज्यादा गिरावट न हो, इसके लिए सरकार एमएसपी पर किसानों से खरीद शुरू करती है। फिलहाल गेहूं, धान और दाल की सरकारी खरीद होती है। साथ ही सरकार दूसरी फसलों पर भी फैसला लेती रहती है।


किसान की लागत, बाजार की चाल और इंडस्ट्रियल कॉस्ट के आधार पर समर्थन मूल्य तय होता है। सरकार बुआई शुरू होने से पहले एमएसपी का एलान करती है। खरीफ का एमएसपी जून में और रबी एमएसपी का एलान नवंबर में होता है।