आवाज़ अड्डा: आंदोलन को मजबूर किसान, क्या है निदान! -
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आवाज़ अड्डा: आंदोलन को मजबूर किसान, क्या है निदान!

प्रकाशित Fri, 09, 2017 पर 20:25  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

मंदसौर कांड के बाद किसानों के गुस्से ने अब देशभर में आंदोलन का रूप ले लिया है और अब चर्चा इस बात की हो रही है कि किसानों को सिर्फ कर्ज माफी ही नहीं एक ढांचागत बदलाव की जरूरत है। मोदी सरकार हो या इससे पहले की सरकारें किसानों की हालत कभी अच्छी नहीं रही है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि किसान इस पूरे सिस्टम में न सिर्फ सबसे निचले पायदान पर है। बल्कि उसके लिए अच्छे दिनों का रास्ता अंधेरे में टूटते तारे जैसा है। उपज ज्यादा हो तो लागत भी नहीं निकलती और पैदावार कम हो तो भूखमरी की हालत हो जाती है। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि राजनीति से ऊपर उठकर हमारे अन्नदाता को बदहाली से निकालने के पुख्ता इंतजाम किए जाएं, इसमें सरकार, समाज और हमारी आप सबकी जिम्मेदारी होगी।


देश के किसान परेशान हैं, उनको उनकी फसलों का वाजिब भाव नहीं मिल रहा। ज्यादातर फसलें पिछले 3-5 साल के निचले स्तर पर हैं। सोयाबीन, सरसों, दाल और गेहूं एमएसपी के नीचे बिक रहे हैं। नवंबर से सब्जियों के भाव जमीन पर हैं। सिंचाई और बिजली की पर्याप्त सुविधा नहीं है और बाजार की उचित व्यवस्था का अभाव है।


भाव गिरने पर सरकार अक्सर इंपोर्ट पर पाबंदी लगाती है, एक्सपोर्ट को बढ़ावा देती और स्टॉक लिमिट में छूट देती है। वहीं महंगाई बढ़ने पर सरकार एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगाती है, इंपोर्ट आसान करती है और स्टॉक लिमिट लगाती है।


जानकारों के मुताबिक सरकार की कमियां ये हैं कि राज्य और केंद्र में तालमेल नहीं है। इसकी वजह से फैसले लेने में अक्सर देरी होती है। मार्केट इंटेलिजेंस की कमी है। खेती की पारदर्शी नीतियां नहीं हैं। पॉलिसी कारोबारियों के पक्ष में हैं। खेती की लागत घटाने पर जोर नहीं है। सिर्फ एमएसपी से किसानों को खुश करने की कोशिश की जाती है।


देश में खेती की तस्वीर की बात करें तो साल 2010 के बाद से देश में अनाज पैदावार 25 फीसदी बढ़कर 27.3 करोड़ टन हो गया है। गेहूं, दाल और सोयाबीन की पैदावार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। अगले साल भी देश में रिकॉर्ड पैदावार का अनुमान है।


खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है। प्रमुख 8 में से 6 फसलों का दाम एमएसपी के नीचे हैं। नवंबर के बाद से सब्जियों की कीमत जमीन पर है। 5 साल में अनाज पैदावार करीब 25 फीसदी बढ़ी है लेकिन भाव में औसत 20 फीसदी की बढ़त हुई है। सोयाबीन का भाव 5 साल के निचले स्तर पर है तो सरसों का भाव 2.5 साल के निचले स्तर पर है जबकि गेहूं का भाव 1 साल के निचले स्तर पर है।