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कमोडिटी आउटलुक: तेल ने बिगाड़ा तिलहन का खेल

प्रकाशित Fri, 16, 2017 पर 17:01  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

खाने के तेल। रसोई में अहम रोल निभाने वाले खाने के तेलों का करीब आधा हिस्सा इंपोर्ट करना पड़ता है। लेकिन इस बार खाने के तेलों के इंपोर्ट की किसानों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। देश में तिलहन का बंपर पैदावार है। ऊपर से सस्ते तेल का इंपोर्ट पिछले महीने करीब 32 फीसदी बढ़ गया है। ऐसे में सोयाबीन और सरसों की मांग पर असर पड़ा है। खबर है कि मध्यप्रदेश की करीब आधी सोया मिलें बंद हो गई हैं। ऐसे में तिलहन की कीमतें लगातार टूटती जा रही है। सामने अब खरीफ सीजन है। ऐसे में आज हम समझेंगे आगे कैसी रहेगी खाने के तेल और तिलहन की चाल।


घरेलू बाजार में इंपोर्टेड तेल की भरमार है। मई में खाने के तेलों का इंपोर्ट 32 फीसदी बढ़ा है। लगातार दूसरे महीने खाने के तेलों का इंपोर्ट बढ़ा है। कुल तेल इंपोर्ट में रिफाइंड की हिस्सेदारी 22 फीसदी पर पहुंच गई है, ऐसे में तेल इंपोर्ट से तिलहन की मांग में भारी कमी देखने को मिली है। मांग में कमी से सोयाबीन और सरसों का दाम एमएसपी के नीचे आ गया है।


इस साल जनवरी में खाने के तेलों का इंपोर्ट 19 फीसदी घटा था, लेकिन फरवरी में इंपोर्ट 14 फीसदी बढ़ गया। मार्च में खाने के तेलों का इंपोर्ट 6 फीसदी घटा, तो अप्रैल में इंपोर्ट 7 फीसदी बढ़ा था। हालांकि मई में खाने के तेलों के इंपोर्ट में 32 फीसदी की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मार्च में 2.2 लाख टन रिफाइंड तेल इंपोर्ट किया गया, जबकि अप्रैल में 2.3 लाख टन इंपोर्ट हुआ। वहीं मई में 2.9 लाख टन रिफाइंड तेल इंपोर्ट किया गया।


दरअसल ग्लोबल मार्केट में सस्ते भाव से रिफाइंड तेल का इंपोर्ट बढ़ा है। साथ ही इंडोनेशिया और मलेशिया से रिफाइंड एक्सपोर्ट सस्ता होता है। मलेशिया में कच्चे खाने के तेल पर 12 फीसदी एक्सपोर्ट ड्यूटी लगाई गई है। इन्हीं सभी कारणों के चलते तिलहन के किसानों को सही दाम नहीं मिल पा रहा है। सोयाबीन का दाम 5 साल के निचले स्तर पर आ गया है, जबकि सरसों का भाव एमएसपी के नीचे आ गया है। तेल का इंपोर्ट बढ़ने से इंडस्ट्री भी परेशान है। हालांकि सरकार तेल पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से इनकार कर रही है। साथ ही बंपर पैदावार से कीमतों पर दोहरा दबाव पड़ा है।