आवाज अड्डाः राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद, क्या बन पाएगी सहमति! -
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आवाज अड्डाः राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद, क्या बन पाएगी सहमति!

प्रकाशित Mon, 19, 2017 पर 20:48  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

जिसका इंतजार था वो एलान तो हो गया और जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। बीजेपी ने राष्ट्रपति चुनाव में एक तुरुप का पत्ता सामने कर दिया है। तमाम अटकलों और समीकरणों को फेल कर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है। ऐसे नहीं तो वैसे सही, राष्ट्रपति भवन में राम नाम तो गूंजेगा। विपक्ष के लिए अब मुकाबले का उम्मीदवार तलाशना कड़ी चुनौती है। टीआरएस और एआईएडीएमके जैसी पार्टियों ने तो उन्हें समर्थन देने का एलान भी कर दिया है और जेडीयू या बीएसपी जैसी पार्टियों से समर्थन के संकेत दिख रहे हैं। हालांकि कांग्रेस, लेफ्ट और टीएमसी जैसी पार्टियों ने संकेत दिए हैं कि कोविंद के नाम पर राजी होने के बजाय वो अपना उम्मीदवार खड़ा करने पर विचार करेंगी।


एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सस्पेंस खत्म हो गया है। राष्ट्रपति भवन में राम नाम की गूंज की तैयारी हो गई है। बीजेपी ने बिहार के मौजूदा राज्यपाल और बीजेपी के दलित नेता रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया गया है। लेकिन रामनाथ कोविंद के नाम पर पार्टियों के बीच आम सहमति बनती नहीं दिख रही है। कांग्रेस, लेफ्ट और टीएमसी जैसी कई पार्टियों ने अपना उम्मीदवार खड़ा करने के साफ संकेत दिए हैं। ऐसे में लग रहा है कि राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला होकर रहेगा।


ना सुषमा स्वराज, ना द्रौपदी मुर्मू, ना लालकृष्ण आडवाणी, ना थावर चंद गहलौत। मोदी जी ने एक ऐसे नाम को सामने रखकर सबको एक बार फिर चकरा दिया, जिसके नाम की कोई सुगबुगाहट भी नहीं थी। वो नाम है रामनाथ कोविंद। ये बिहार के राज्यपाल हैं। ये दलित समाज से आते हैं और बीजेपी इसे इनकी सबसे बड़ी यूएसपी बता रही है।


दलित उम्मीदवार को आगे करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मास्टरस्ट्रोक चला है। यूपी की राजनीतिक पार्टियां रामनाथ कोविंद के नाम पर दुविधा में पड़ गई हैं। दूसरी तरफ नीतीश कुमार तो रामनाथ कोविंद से मिलकर उन्हें बधाई भी दे डाली। हालांकि उन्होंने अपनी पार्टी के पत्ते नहीं खोले हैं।


लेकिन कांग्रेस, लेफ्ट और टीएमसी ने साफ कहा है कि वो रामनाथ कोविंद के नाम पर सहमत नहीं है। उनसे कोविंद के नाम पर सलाह मश्विरा नहीं किया गया और 22 जून को विपक्षी दलों की बैठक में विपक्ष के उम्मीदवार का फैसला होगा।


बता दें कि रामनाथ कोविंद का जन्म 1 अक्टूबर 1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की तहसील डेरापुर के एक छोटे से गांव परौंख में हुआ था। रामनाथ कोविंद कानपुर यूनिवर्सिटी से बीकॉम और एलएलबी हैं। वकालत की उपाधि लेने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत प्रारंभ की। 1977 से 1979 तक दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार के वकील रहे, कोविंद संघ के कद्दावर नेता रहे हैं। ये 1991 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए फिर 1994 और 2000 में उत्तरप्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। कोविंद लगातार 12 वर्ष तक राज्यसभा सांसद रहे। कोविंद कई संसदीय समितियों के सदस्य रहे। कोविंद बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं, वो बीजेपी दलित मोर्चा और अखिल भारतीय कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे। 8 अगस्त 2015 को उनकी बिहार के राज्यपाल के पद पर नियुक्ति हुई। रामनाथ कोविंद वकील से लेकर राजनेता तक की भूमिकाओं में हमेशा कमजोर वर्ग के हक की लड़ाई लड़ते रहे हैं।


एनडीए में कोविंद के नाम पर सहमति बनाने के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा कि मुझे पूरा भरोसा है कि रामनाथ कोविंद एक बेहतर राष्ट्रपति साबित होंगे। संविधान और कानून पर उनकी गहरी पकड़ा है, इससे देश को फायदा होगा। वो गरीबों और पिछड़ों की आवाज बनेंगे।


वहीं कांग्रेस ने कोविंद के नाम पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि पार्टी विपक्ष के दूसरे नेताओं से बात के बाद ही कोविंद के नाम पर फैसला लेगी। उधर शिवसेना का भी कहना है कि पार्टी बैठक के बाद ही कोविंद के नाम पर अपना रुख साफ करेगी।


लेफ्ट पार्टियों सीपीएम और सीपीआई ने राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद के नाम का विरोध किया है। सीपीएम का कहना है कि कोविंद के नाम का चुनाव सर्वसम्मति से नहीं हुआ है।


रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी से बीजेपी ने एक तीर से कई शिकार किए हैं। पहला ये कि दलित उम्मीदवार पेश करके बीजेपी ने उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है, जो पार्टी पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा रहे थे। दूसरा ये कि इससे विपक्ष की एकता में दरार पड़ती दिख रही है। तीसरे ये कि रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी से आरएसएस भी खुश होगा, क्योंकि वो संघ से जुड़े भी रहे हैं। इनकी उम्मीदवारी से बीजेपी ने ये भी साफ संकेत दे दिया है कि वो हिंदुत्व के एजेंडे से पीछे हटने वाली नहीं हैं। अब देखना है कि विपक्ष रामनाथ कोविंद के मुकाबले किसका नाम आगे करता है और मुकाबला महज सांकेतिक होगा या वो कोई चैलेंज भी पेश कर पाएगा ?