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आवाज अड्डाः कैंपस राजनीति पर हाईकोर्ट सख्त, क्या लगेगी रोक!

प्रकाशित Wed, 12, 2017 पर 20:51  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक महिला डीन के साथ बदसलूकी के मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने छात्र राजनीति पर तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यूनिवर्सिटी बदमाशों का अड्डा नहीं है। विश्वविद्यालय तो स्वतंत्र सोच वालों के लिए सीखने की जगह है। यही नहीं कोर्ट ने कहा है कि कैंपस में लोग जिस तरह का बर्ताव कर रहे हैं, उससे तो लगता है कि कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा देनी चाहिए।


छात्र राजनीति के मौजूदा स्वरुप और उसकी जरूरत पर नए सिरे से सोचने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। छात्र यूनियनों के चुनाव में राजनीतिक पार्टियां की जोर-आजमाइश और अनाप-शनाप खर्च विवाद का विषय रहे हैं। कैंपस में छात्र संगठनों और नेताओं का वर्चस्व, छात्रों को राजनीतिक आधार पर बांट दिया जाना, विश्वविद्यालय में स्वतंत्र सोच और अकादमिक माहौल के लिए ठीक नहीं माने जाते। छात्र राजनीति में दबंगई अनिवार्य शर्त बनती जा रही है। एक तरफ सरकारी कॉलेज और यूनिवर्सिटी छात्र राजनीति के अखाड़े में तब्दील हो रहे हैं तो दूसरी तरफ आईआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान और उच्च शिक्षा के प्राइवेट संस्थान छात्र राजनीति से दूरी बनाकर चलते हैं।


दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस लॉ सेंटर की डीन के साथ बदसलूकी मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की है कि यूनिवर्सिटी बदमाशों का अड्डा नहीं बनना चाहिए। और जैसे हालात दिख रहे हैं, उससे तो लगता है कि कैंपस में सारी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा देनी चाहिए। मई महीने में कैंपस लॉ सेंटर के छात्र अटेंडेंस में कमी के चलते परीक्षा देने से रोके गए थे। इसी के विरोध के दौरान महिला डीन को उनके ऑफिस में घेरकर छात्रों ने बदतमीजी की और धमकी दी कि उन्हें किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेंगे। कोर्ट ने मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मामले का स्वत: संज्ञान लिया था।


यूनिवर्सिटी में छात्रों द्वारा हाल के बवाल पर नजर डाले तो फरवरी 2017 में गुरमेहर कौर का मामला उठाया गया था। जिसमें एबीवीपी के खिलाफ गुरमेहर का विडियो बना कर दिल्ली विश्वविद्यालय में कई दिन हंगामे किये गया था। वहीं जाधवपुर विश्वविद्यालय में अलग-अलग मामलों पर प्रदर्शन हुए। जनवरी 2016 में रोहित वेमूला का मामला हुआ। फरवरी 2016 में जेएनयू में राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाया गया जबकि केरल में बीफ बैन के मामलों पर प्रदर्शन हुए।


प्रेसिडेंट, वाइस प्रेसिडेंट, सेक्रेटरी, ज्वाइंट सेक्रेटरी के चार पदों के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र चुनाव किए जाते है। अनुमान के मुताबिक हर उम्मीदवार 1 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करता है। एनएसयूआई और एबीवीपी के जरिए कांग्रेस-बीजेपी की लड़ाई होती है। इतना ही नहीं वोट के लिए शराब, पैसा, सिनेमा टिकट, पार्टी देने का आरोप भी इन चुनावों में लगये गये है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र चुनाव में 50 कॉलेजों के 1.5 लाख छात्र वोट देते हैं।


विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव के तरीक कुछ इस प्रकार है। पहला प्रकार नॉमिनेशन यानि मेरिट या को-कैरिकुलर एक्टिविटी के आधार काउंसिल में छात्रों का चुनाव किया जाता है। दूसरा क्लास रिप्रेजेंटेशन यानि क्लास के प्रतिनिधि का चुनाव, फिर वो प्रतिनिधि अपना अध्यक्ष और सचिव चुनते हैं। तीसरा प्रकार प्रत्यक्ष चुनाव यानि आम चुनावों की तरह हर एक पद के लिए सभी छात्रों को वोट देने का अधिकार दिया जाता है। चौथा प्रकार  मिश्रित व्यवस्था यानि एक ही यूनिवर्सिटी में सभी तरह की व्यवस्था होती है और कुछ का चुनाव, कुछ का नॉमिनेशन किया जाता है।


गौरतलब हो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर साल 2005 में छात्र संघों के चुनाव में सुधार की सिफारिश के लिए लिंगदोह कमिटी बनाई गई। जिसके पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह कमिटी के अध्यक्ष बनाएं गए। मई 2006 में कमिटी ने शिक्षा मंत्रालय को अपनी बनाई हुई रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में चुनाव सुधार के हर बिन्दु पर लिंगदोह कमिटी की सिफारिशें थी।


दरअसल, कमिटी की छात्र संघ नहीं लागू करना चाहती थी। लिंगदोह कमिटी की सिफारिश थी कि छात्र संघ चुनावों को राजनीतिक पार्टियों से अलग रखा जाये और सत्र के दूसरे महीने में 10 दिन में चुनावी प्रक्रिया खत्म करें। उम्मदीवार की आयु - बीए- 22 वर्ष, एमए- 25 वर्ष, MPhil/Ph.D - 28 वर्ष तय की जाएं। कमिटी की सिफारिश थी कि सेंट्रल पोस्ट के लिए सिर्फ एक बार चुनाव लड़ने की इजाजत दी जाएं। फेल होने/परीक्षा छोड़ने वालों छात्रों के चुनाव लड़ने पर रोका जाएं। चुनाव लड़ने के लिए सत्र में 75 फीसदी उपस्थिति अनिवार्य की जाएं। इतना ही नहीं कमिटी की सिफारिशें थी कि चुनाव लड़ने वालों का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए। चुनाव के खिलाफ शिकायत निवारण की आंतरिक व्यवस्था भी की जाएं। चुनाव की खर्च की अधिकतम सीमा प्रति उम्मीदवार 5000 रुपये तय की जाएं।


इधर, शिक्षा में अमेरिका, चीन के बाद भारत में सबसे बड़ा क्षेत्र माना गया है। भारत में अलग-अलग तरह के 784 विश्वविद्यालय है और  यूनिवर्सिटी के 4 प्रकार - जिसमें सेंट्रल, स्टेट, डीम्ड, प्राइवेट यूनिवर्सिटी चलाई जाती है।


 सवाल तो उठता है कि क्या छात्र राजनीति पर रोक लगनी चाहिए? या कम से कम कैंपस को संसदीय राजनीति करने वाली पार्टियों से अलग कर देना चाहिए? इसी विषय पर आज चर्चा होगी।