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आवाज़ आंत्रप्रेन्योर: महिलाओं की जरूरतें पूरी करने का सरल तरीका

प्रकाशित Sat, 05, 2017 पर 16:10  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

आज शुरूआत करते हैं एक ऐसी जोडी से जिनका मकसद है देश की हर महिला महावारी के दिनों में अपना खयाल रखें। मुंबई के सुहानी और कार्तिक उन आंत्रप्रेन्योर में शामिल है जो सिर्फ मुनाफा और बडे ब्रांड बनाने के लक्ष्य से कारोबार में नहीं उतरे है, इनका मकसद हैं देश की सभी महिलाएं स्वस्थ रहें। 2015 में इन दो आंत्रप्रेन्योर ने मिल कर शुरू किया सरल डिजाईन जो ग्रामिण और पिछडे वर्ग की महिलाओ को मेन्सटुरल हाईजीन मेंटेंन करने के लिए किफायती सैनिटरी नेपकिन मुहैय्या कराती है।


पढ़ाई, कारोबार, नौकरी और खेल कूद में आगे रहने वाली महिलाए आज भी अपने स्वास्थ का ठिक से ख्याल नहीं रख रहीं हैं। माहवारी के दिनों में अपनी पूरी सफ़ाई नहीं रखने की वजह से देश की एसी कई महिलाओं जिनको इंफेकशन और बिमारियों से जूझना पडता हैं। और ये समस्या छोटे शहर और लो इंकम ग्रुप की महिलाओं में ज्यादा हैं। इस समस्या के पीछे एक बडी वजह हैं किफायती हाईजिन प्रोडक्टस् की कमी। इसी बडी दिक्कत का हल निकालने के मकसद से सुहानी मोहन और कार्तिक मेहता ने लो कॉस्ट सैनिटरी नेपकीन मैन्यूफैक्चर करना शुरू किया जो बाजार में बिक रहें बडे ब्रांड की तुलना में आधे दाम पर उपलब्ध हैं। इसकी रिटेल कीमत है महज 35 रुपये।


सरल की फाउंडर सुहानी को महिलाओं की बेसिक हेल्थ बेहतर करने में योगदान देने का मन बना जब वो गूंज की अंशू गुप्ता से मिली और ये एहसास हुआ की देश की कई महिलाए है जो अपने लिए सैनिटरी नैपकिन भी नहीं खरीद सकती हैं और सस्ते नैपकिन बनाने के लिए पूरी मैन्यूफैक्चरिंग प्रोसेस को रिइन्वेंट करने के बजाए उसे स्मॉल स्केल पर ले जाने में कार्तिक की मशीन डिजाइनिंग की डिग्री काम आई।


कंपनी का मैन्युफैक्चरींग यूनिट नवी मुंबई में है। और एसी यूनिट को लगाने में 10 लाख का निवेश लगता है। इन छोटी यूनिट की खासियत यही हैं की मांग बढने पर इनकी कैपेसिटी आसानी से बढाई जा सकती हैं। यहां रोजाना हर 45 मिनट में 15000 पैड्स बनाएं जाते है। सरल के नैपकिन सस्ते भले ही है लेकिन इनकी क्वालिटी पर कंपनी ने कोई समझौता नही किया हैं, इसलिए रॉ मटेरियल को जाने माने सप्लायर्स से ही खरीदते हैं।


सुहानी और कार्तिक ने अपने कारोबार को डिसेंट्रलाइज मॉडल में ढाला है यानी डिस्ट्रीब्यूशन के लिए कोई मिडलमेन नही हैं। लेकिन इस कॉम्पिटीटिव मार्केट में प्रोडक्ट डिस्ट्रीब्यूशन और रिटेल करना आसान काम नहीं है, इसलिए कंपनी एनजीओ की मदद से अपने प्रोडक्ट मार्केट करती है। सरल अब टियर 2-3 शहरों में अपने ब्रांड एक्टिव को रिटेल कर रही हैं साथ ही अमेजोन जैसे ई- कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी अपने प्रोडक्ट बेच रही हैं। कंपनी  आगे चलकर फ्रेंचाइजी मॉडल के जरीए अपनी पहुंच देश के कोने कोने में बनाना चाहती है।


19000 करोड़ रुपये के सैनेटरी नैपकीन के मार्केट में सिर्फ 20 फीसदी महिलाए ही इन प्रोडक्ट को इस्तमाल कर रही हैं। यानी सरल जैसी कंपनियों की जरूरत है जो महिलाओं को बेहतर स्वास्थ सुविधा दे सकें।