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आवाज़ अड्डा: देश में नेतागिरी बनी कमाई का जरिया!

प्रकाशित Fri, 08, 2017 पर 09:48  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

हमारे देश में ज्यादातर नेताओं की कमाई, दिन दूनी, रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ती है। इसको लेकर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन पेंच ये है कि जिस पर सवाल उठे, वो ज्यादा से ज्यादा सफाई दे सकता है। जब जांच और कार्रवाई की बात होती है तो सब मिलकर एक हो जाते हैं या फिर राजनीतिक दुश्मनी साधने के लिए भ्रष्टाचार के चुनिंदा मामलों का इस्तेमाल होता है। नेताओं की कमान उनकी पार्टी के हाथ में भी होती हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियां खुद बेनामी चंदे और काला धन पर अपना खर्च चलाती हैं। कुल मिलाकर पूरा राजनीतिक माहौल, रुपये-पैसों के मामले में कच्चा-पक्का के खेल में उलझा हुआ नजर आता है और सबसे बड़ी विडंबना ये है कि यही राजनीतिक वर्ग देश चलाता है, राज्यों की सरकारें चलाता है। आवाज़ अड्डा में इसी पहेली को थोड़ा सुलझाने की कोशिश की जा रही है लेकिन शुरुआत करते हैं एक रिपोर्ट के साथ।


सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से एक हफ्ते में जवाब देने को कहा है कि उन 289 एमपी, एमएलए के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई जिनकी संपत्ति 2009 से 2014 के बीच 500 फीसदी तक की वृद्धि हुई? इस लिस्ट में सभी पार्टियों के नेता शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि ये जांच करना जरूरी है कि इनकी संपत्ति जायज तरीके से बढ़ी है या नाजायज तरीके से। कोर्ट ने कहा कि 2015 में एक एनजीओ ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस को इस बारे में ज्ञापन सौंपा था। सरकार की तरफ से कहा गया कि इसपर कुछ चुनिंदा मामलों की जांच हुई है। लेकिन कोर्ट कहा कि ये ढुलमुल जवाब है। सीबीडीटी ने अब तक जो एक्शन लिए हैं उसके बारे में एफिडेवड दें।


जिस एडीआर की रिपोर्ट पर कोर्ट ने सरकार को खरी-खोटी सुनाई, उसी की एक और रिपोर्ट अभी सामने आई है। इसमें बताया गया है कि 2015-16 में 7 राष्ट्रीय पार्टियों को 1 हजार 33 करोड़ का चंदा मिला जिसमें से ज्यातर पैसा किसने दिया है इसका पता नहीं है। दो बड़ी पार्टियों की आय को देखें तो बीजपी को 80 फीसदी और कांग्रेस को 71 फीसदी चंदा कहां से आया है ये पता नहीं है।


सवाल उठता है कि क्या देश को ये जानने का हक नहीं है कि जिन्हें हम सरकार चलाने की जिम्मेदारी सौंप रहे हैं उन राजनीतिक पार्टियों का खर्चा कौन चला रहा है? सवाल सिर्फ पार्टियों का नहीं, आम तौर पर देखा जाता है कि चुनाव लड़ने और जीतने वाले नेताओं की संपति दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती है। तो क्या राजनीति का दामन थामने वालों, खासकर एमपी, एमएलए बन जाने वालों को कमाई का कोई सिक्रेट फॉर्मूला हाथ लग जाता है? अगर राजनीति कमाई का रास्ता खोलती है तो क्या अब राजनीति में आने वाले ज्यादातर लोगों का मकसद कमाई करना हो गया है!