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आवाज़ अड्डा: मस्जिद में मोदी, संजीदा कोशिश या दिखावा!

प्रकाशित Thu, 14, 2017 पर 08:50  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अहमदाबाद को हाल ही में यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरीटेज सिटी घोषित किया है। इसलिए बतौर मेजबान शिंजो आबे को अहमदाबाद के इतिहास और संस्कृति की झलक दिखाना तो बनता था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इसके लिए सिदी सैयद की मस्जिद को ही क्यों चुना? क्या वो शिंजो आबे को सिदी सैयद की वो जाली दिखाना चाहते थे, जो ऐतिहासिक होने के साथ-साथ आईआईएम अहमदाबाद के लोगो का हिस्सा है। ये सवाल इसलिए क्योंकि मोदी ने इसी बहाने पहली बार देश की किसी मस्जिद में कदम रखा है। यही नहीं जापान के प्रधानमंत्री को सिदी सैयद की जाली की खासियतें बताने का काम भी खुद मोदी ने किया। इधर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी पहली बार हिंदूत्व की बड़ी उदार व्याख्या की है। तो मोहन भागवत की उदार बातों और मस्जिद में मोदी के पहले कदम के राजनीतिक मायने क्या हैं? आज अड्डा में इसी पर चर्चा होगी।


आपको बता दें कि 1573 में बनी सिदी सैयद की मस्जिद मेहराबों में बनी जाली के लिए जानी जाती है। लेकिन अब ये भारत की पहली मस्जिद बन गई है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कदम पड़े। इससे पहले वो अबु धाबी की शेख जायद मस्जिद में जा चुके हैं। हाल में वो म्यांमार में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मजार पर गए भी गए थे और अजमेर में ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर जियारत की चादर भी भेज चुके हैं। मगर एक ऐसे वक्त में जब बीजेपी, आरएसएस पर विरोधियों को चुप कराने के लिए हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लग रहा है, मोदी के मस्जिद जाने में कोई संदेश ढूंढा जाना स्वाभाविक है।


ध्यान देने वाली बात है कि कल ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू होने का उदार मतलब समझाया है। 50 देशों के डिप्लोमैट्स के बीच भागवत ने कहा कि कोई क्या खाता है और क्या पहनता है इससे हिंदू होने कोई लेना देना नहीं है, बल्कि जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करना हिंदू होना है। तो क्या आरएसएस और बीजेपी मुसलमानों को नए सिरे से कोई संदेश देना चाहते हैं? अगर ऐसा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन सवाल ये है कि क्या ये एक संजीदा कोशिश है या कोई नई राजनीतिक चाल?और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या मस्जिद में जाने भर से मोदी मुसलमानों का दिल जीत पाएंगे!