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आवाज़ अड्डाः पेट्रोलियम जीएसटी से बाहर क्यों, सरकार को नहीं परवाह

प्रकाशित Sat, 16, 2017 पर 11:57  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने को देश के लोग नियति मानते रहे हैं। आम आदमी यही जानता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो पेट्रोल और डीजल के दाम भी बढ़ जाते हैं। लेकिन जब ये पता लगता है कि कच्चे तेल के दाम घटने पर, पेट्रोल का दाम नहीं घटता तो जनता पूछती है कि आखिर क्यों?


सरकार कहती है कि जनहित के काम करने के लिए पैसा जुटाना है, इसलिए सरकार टैक्स बढ़ाकर घटती कीमतों का फायदा अपने पास खींच लेती है। लेकिन सवाल है कि ऐसा कब तक, कीमतें बढ़ने पर तो आप टैक्स नहीं घटाते। तेल के दाम बाजार के हवाले करते वक्त कहा गया कि सरकार इसमें दखलअंदाजी नहीं चाहती। तो फिर टैक्स बढ़ाकर कीमतों को कम होने से रोकना क्या दखलअंदाजी नहीं है। और बीजेपी का एक नारा भी है कि बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार। ये नारा शायद अब भुला दिया गया है। ऐसे कई अहम सवाल हैं जो जवाब चाहते हैं। अड्डा में आज इसी पर चर्चा होगी।


पेट्रोल, डीजल के दाम को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल पेट्रोल और डीजल के दाम 3 साल के उच्चतम स्तर को छू रहे हैं, जबकि 2014 से 2017 के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत आधी हो चुकी है। शुरुआती दिनों में जब पेट्रोलियम के दाम गिर रहे थे तो केंद्र सरकार ने 9 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई, लिहाजा पेट्रोलियम की कीमतें घटने की बजाय लगभग स्थिर रहीं, और बचत का पैसा सरकार के खजाने में चला गया। अब सरकार का तर्क है कि विकास योजनाएं चलने के लिए उसी पैसे का इस्तेमाल किया जाता है।


साफ है कि फ्री मार्केट के नाम पर सरकार पेट्रोलियम की कीमत तय करने में दखल नहीं देना चाहती, लेकिन टैक्स बढ़ाकर कंज्यूमर का हिस्सा मार लेती है ताकि उसकी कमाई बनी रहे। अपनी कमाई बचाए रखने के लिए ही केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर पेट्रोलियम को जीएसटी से भी बाहर रखा। लेकिन अब बीजेपी को याद दिलाया जा रहा है कि यूपीए सरकार में पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस के दाम पर वो कैसे प्रदर्शन करती थी। प्रधानमंत्री को वो इलेक्शन कैंपेन याद दिलाया जा रहा है, जिसमें कहा गया था कि बहुत हुई पेट्रोल डीजल की मार। विपक्ष अब पूछ रहा है क्रूड के घटते दाम का फायदा जनता को कब मिलेगा।


पेट्रोल-डीजल की कीमत में आधे से ज्यादा हिस्सा केंद्र और राज्यों के टैक्स का है। सवाल उठता है कि क्या सरकार पेट्रोल को भी शराब की तरह देखती है? डायनामिक प्राइसिंग में दाम बढ़ते हैं तो सरकार टैक्स घटाकर कंज्यूमर को राहत नहीं देती, तो फिर कीमत घटने की स्थिति में टैक्स बढ़ाकर वो कंज्यूमर का हक कैसे मार सकती है? क्या ये एक तरह की मुनाफाखोरी नहीं है?