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आवाज अड्डाः नोटबंदी का 1 साल, फायदा या नुकसान!

प्रकाशित Tue, 07, 2017 पर 21:03  |  स्रोत : Hindi.in.com

नोटबंदी का 1 साल पूरा हो चुका है, लेकिन पिछले साल 8 नवंबर को पैदा हुआ, यह प्रश्न आज भी जहां का तहां खड़ा है- नोटबंदी से कष्ट ज्यादा हुए या फायदे? 8 नवंबर की उस शाम प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का मकसद बताया था- कालाधन, भ्रष्टाचार, नकली नोट और टेरर फंडिंग को खत्म करना। इन चार मोर्चों पर नोटबंदी कितनी कामयाब रही- इसके जवाब में सरकार कई दूसरे फायदे गिनाती है, जिनका सीधा संबंध नोटबंदी से ज्यादा डिजिटाइजेशन से बनता है। तो क्या सिर्फ डिजिटलाइजेशन और कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए नोटबंदी लागू की गई थी? ऐसे में विपक्ष भी नोटबंदी के नाम पर संगठित लूट और काला धन को सफेद करने का आरोप लगा रहा है। आलम ये है कि बीजेपी काला धन विरोध दिवस के तौर पर नोटबंदी की वर्षगांठ मना रही है तो कांग्रेस इसे काला दिन बता रही है।


8 नवंबर को प्रधानमंत्री की बातों से ऐसा लगा था कि सरकार बिल्कुल सधे हुए तरीके से कालाधन, नकली नोट, टेरर फंडिंग और भ्रष्टाचार पर निशाना लगा रही है। और 50 दिनों का रोडमैप बिल्कुल साफ है। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, नई-नई चुनौतियां सामने आती गईं। सरकार नोटबंदी के नियमों में फेरबदल करती रही और नोटबंदी का गोलपोस्ट यानि मकसद भी बदलती गई। लोगों को बैंक और एटीएम की कतारों से मुक्त होने में कई महीने लग गए, असंगठित क्षेत्र में कारोबार प्रभावित हुआ, नौकरियां गईं।


कैश पर चलने वाली ग्रामीण इकोनॉमी ने झटके खाए। संगठित क्षेत्र में भी कई महीनों तक असर रहा। बैंकिंग और फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी जैसे कुछ सेक्टर को जरूर कुछ फायदा हुआ। अब एक साल बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि बीजेपी की तरफ से हम ये मानते हैं कि इकोनॉमी के लिए यथास्थिति को बदलना जरुरी था।


साफ है कि सरकार डिजिटाइजेशन और पारदर्शिता के फायदे बताकर नोटबंदी को ऐतिहासिक कदम साबित करना चाहती है। जबकि विपक्ष कहता है कि लेस कैश इकोनॉमी के लिए साधन और भी हैं। नोटबंदी ने आम लोगों के लिए मुसीबत खड़ी की और धनी और ताकतवर लोगों को अपना काला धन सफेद करने का मौका दिया। इस तरह से नोटबंदी एक संगठित और कानूनी लूट साबित हुई है।


नोटबंदी के अब तक के फायदों की बात की जाएं तो एक रिपोर्ट के मुताबिक हवाला में 50 फीसदी कमी आई है। बैंकों में नकदी बढ़ी और नए अकाउंट खोले गए। नोटबंदी के तुरंत बाद डिजिटल ट्रांजैक्शन बढ़ा। केवल दिसंबर 2016 में डिजिटल ट्रांजैक्शन 300 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली थी। इस साल अगस्त-सितंबर में 13.5 फीसदी की ग्रोथ देखी गई। सितंबर में 124.69 लाख करोड़ का ट्रांजैक्शन हुआ है यानि यूपीआई से ट्रांजैक्शन में 10 गुना वृद्धि हुई। इक्विटी म्युचुअल फंड में निवेश बढ़ा। इक्विटी म्युचुअल फंड 0.6 डॉलर से बढ़कर 4 अरब डॉलर का इजाफा हुआ। साथ ही टैक्स रेवेन्यू 18 फीसदी बढ़कर 17.1 लाख करोड़ रुपये हुई।


इन सब के बावजूद नोटबंदी की चोट कुछ सेक्टर के लिए मंहगी पड़ी। नोटबंदी से ना केवल रियल एस्टेट सेक्टर पर मार पड़ी बल्कि इसके बाद 40 फीसदी तक कारोबार में गिरावट आई। असंगठित क्षेत्र को गहरा धक्का लगा जबकि 15 लाख नौकरियां खत्म होने का अनुमान है। निजी निवेश का प्रवाह रुका जिसके कारण वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 5.7 फीसदी तक फिसली। वहीं निजी उपभोग में गिरावट देखने को मिली।


हकीकत तो यह है कि रिजर्व बैंक का कहना है कि 99 फीसदी पुराने नोट बदल लिए गए। जिसके बाद कैश में काले धन की धारणा पर सवाल उठे है। हालांकि सरकार का दावा है कि ब्लैक मनी का सारा हिसाब बैकों के पास है और सरकार  एक-एक पैसे का हिसाब देगी। सरकार का यह भी कहना है कि काला धन वालों को पकड़ने में समय लगेगा। पीएम मोदी ने कहा था कि 18 लाख से ज्यादा लोग शक के घेरे में है, जिनकी आय घोषित संपत्ति से ज्यादा है जबकि 1.75 लाख करोड़ जांच के दायरे में है और सरकार ने अब तक 800 करोड़ रुपये की बेमानी संपत्ति जब्त की है।


विपक्ष से तो आलोचना की ही उम्मीद की जा सकती है, लेकिन सवाल उठता है कि नोटबंदी के साल भर बाद भी क्या सरकार के पास दिखाने के लिए कोई ठोस नतीजा है?