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आवाज़ अड्डा: नोटबंदी, ना सरकार ना विपक्ष दिखा रहा पूरी तस्वीर

प्रकाशित Wed, 08, 2017 पर 20:38  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

नोटबंदी की सालगिरह को हम कैसे मनाएं? सरकार के एक साहसिक फैसले की याद में जश्न मनाएं? काले धन पर जोरदार प्रहार मानें या ये मानें कि इकोनॉमी के लिए काला दिन था, एक राष्ट्रीय त्रासदी थी, एक बेतुका फरमान था जैसा कि विपक्ष कह रहा है। स्वतंत्र राय रखनेवाले जानकारों से बात करें तो वो नोटबंदी को स्याह सफेद के खांचे में डालने से बचते हैं। नहीं करते तब भी चलता, रिस्क तो लिया, कर लिया तो एक्जिक्यूशन दुरुस्त रखते, फायदे दिखने चाहिए वगैरह वगैरह। लेकिन किसी के पास कुछ ठोस गिनाने के लिए नहीं है। फिर बात आप फायदे की करें या नुकसान की। हां - हर पार्टी के लिए ये राजनीति मुद्दा जरूर है। चुनाव पास हों तो जोरदार मुद्दा है और वही हम देख रहे हैं। लेकिन अब सवाल ये है कि नोटबंदी की आंच कब तक इतनी गर्म रहेगी कि उसपर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सके।


विपक्ष के राजनैतिक आरोप हैं कि नोटबंदी लोकतंत्र में तानाशाहों वाला फैसला रहा। घोषित लक्ष्य हासिल नहीं हुए तो लक्ष्य बदले गए। इसमें नैतिकता की दुहाई देकर गलत काम हुए। गरीबों का नाम लेकर गरीबों को सताया गया। काला धन वालों को सफेद करने का मौका दिया गया। कैशलेस इकोनॉमी का झूठा सपना दिखाया गया, ग्रामीण सेक्टर की इकोनॉमी तबाह की गई, नोटबंदी के बिना भी सुधार हो सकते थे। फॉर्मल इकोनॉमी के नाम पर असंगठित क्षेत्र तबाह हो गया।


वहीं सरकार को नोटबंदी क्रांति लगती है। सरकार का कहना है कि इससे कालाधन, बिजनेस, राजनीति का गठजोड़ टूटा। फॉर्मल इकोनॉमी का दायरा बढ़ा है और आगे बढ़ेगा। लेस कैश इकोनॉमी से काला धन रुकेगा। लंबे समय में इकोनॉमी की ग्रोथ रेट बढ़ेगी। बैंकों के पास पैसा जमा करवाने वालों के डिटेल हैं। आईटी काला धन वालों पर शिकंजा कस रहा है। शेल कंपनियों की पहचान हुई है अब इन पर कार्रवाई होगी।