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आवाज अड्डाः दिल्ली सरकार बनाम केंद्र सरकार

प्रकाशित Thu, 30, 2017 पर 12:10  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली के प्रशासन में लेफ्टिनेंट गवर्नर और मुख्यमंत्री के बीच कुछ शिष्टाचार होना चाहिए। छोटी-छोटी बात पर मतभेद नहीं होना चाहिए। लेफ्टिनेंट गवर्नर को प्रशासनिक मामलों में स्टेट्समैनशिप दिखानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में केजरीवाल सरकार और केंद्र के बीच शक्ति के विभाजन पर सुनवाई चल रही है। इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।


हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि विशेष संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है और लेफ्टिनेंट गवर्नर ही दिल्ली के प्रशासन का प्रमुख है। दिल्ली सरकार को अलग से कार्यकारी शक्तियां नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट में मामले पर अभी सुनवाई जारी रहेगी। आवाज़ अड्डा में केजरीवाल सरकार और केंद्र के इसी टकराव और दिल्ली की प्रशासनिक स्थिति पर बात होगी।


दिल्ली में आम आदमी पार्टी के दोबारा सत्ता में आने के कुछ दिन के भीतर ही दिल्ली सरकार और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच टकराव शुरू हो गया था। कुछ अधिकारियों के निलंबन और नियुक्ति पर विवाद इतना गहरा हुआ कि मामला राष्ट्रपति तक पहुंच गया। इसके बाद तो दिल्ली सरकार और एलजी के बीच तकरार रोज रोज की कहानी बन गया।


आम आदमी पार्टी का आरोप है कि दिल्ली के एलजी अब उसके हर फैसले में अडंगा डालते हैं, फाइलों को लटकाए रखते हैं। यहां तक कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों को मिलने का समय तक नहीं देते। पार्टी का आरोप है कि मोदी सरकार एलजी के जरिए आम आदमी पार्टी के कामकाज में अड़ंगा डाल रही है, दिल्ली पर परोक्ष तरीके से शासन करना चाहती है। इसी नीति के तहत केंद्र ने दिल्ली के एंटी करप्शन ब्रांच के अधिकार सीमित किए, एलजी को दिल्ली सरकार की सलाह मानने से मुक्त कर दिया और अधिकारियों के तबादले-नियुक्ति के अधिकार पर भी कब्जा कर लिया। लेकिन इन सारी शिकायतों पर सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट साफ कर चुका है कि विशेष संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है और दिल्ली के प्रशासन का प्रमुख लेफ्टिनेंट गवर्नर है।


संविधान के दायरे में दिल्ली सरकार को अलग से कोई अधिकार नहीं दिए जा सकते। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर अब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ सुनवाई कर रही है। अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि और राज्यों में भी केंद्र से अलग पार्टी की सरकारे हैं। वहां टकराव नहीं होता तो दिल्ली में भी टकराव टाले जा सकते हैं।


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दिल्ली और केंद्र के टकराव की असली वजह प्रशासनिक ना होकर राजनीतिक है? क्या वाकई मोदी सरकार आम आदमी पार्टी की राजनीति खत्म करने के लिए उसके कामकाज में अड़ंगा डाल रही है? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या इस झंझट के स्थायी समाधान के लिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे देना चाहिए?