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आवाज़ अड्डा: क्या आप बना केजरीवाल का जेबी संगठन!

प्रकाशित Fri, 05, 2018 पर 10:57  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर दो गंभीर आरोप लगे हैं। एक, पैसों के लिए बाहरी लोगों को राज्यसभा की सीटें देने का और दूसरा, पार्टी के फाउंडर कुमार विश्वास को ठिकाने लगाने का। वैसे राजनीति में इस तरह के आरोप कोई नई बात नहीं हैं लेकिन आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से पैदा हुई थी और अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में मौजूद तमाम गंदगी को मिटाने और सच्चा लोकतंत्र स्थापित करने के नाम पर अपनी ब्रांडिंग की। लेकिन पार्टी बनने के बाद से ही विवादों का सिलसिला भी जारी है। वैसे इस बार भी आम आदमी पार्टी ने कहा है कि तमाम तरह के आरोप के बावजूद पार्टी चलती रही है और आगे भी चलती रहेगी। सवाल उठता है कि क्या अब अरविंद केजरीवाल भी घाघ राजनेता बन चुके हैं या आम आदमी पार्टी भी राजनीति के अलग-अलग घाटों का पानी पीने को मजबूर है।


आम आदमी पार्टी का दावा है कि पार्टी का विस्तार करने के लिए बाहर से ऐसे लोगों की खोज की गई है जो अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। बिजनेसमैन सुशील गुप्ता और चाटर्ड एकाउंटेंट एन डी गुप्ता इसी खोज का नतीजा हैं। लेकिन लोग ये कह रहे हैं कि कुमार विश्वास को ठिकाने लगाने के लिए ही पार्टी के विस्तार के लिए बाहरी उम्मीदवार का फॉर्मूला लाया गया और इसी बहाने लगे हाथ पैसा भी बनाया गया। अब कुमार विश्वास कह रहे हैं कि उन्होंने कई मुद्दों पर केजरीवाल से अलग बात की, इसलिए केजरीवाल ने बाकायदा योजना बनाकर उनका सफाया किया है।


इधर अरविंद केजरीवाल के पुराने सहयोगी और स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने पैसे लेकर टिकट देने के आरोपों को केजरीवाल का राजनीतिक पतन बताया है। आम आदमी पार्टी के ताजा विवाद ने दूसरी पार्टियों को भी निशाना साधने का मौका दे दिया है। बीजेपी ने कहा है कि एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता ही नहीं संजय सिंह को भी उसी क्राइटेरिया पर चुना गया है। पंजाब चुनाव में संजय सिंह पर भी पैसा लेकर टिकट बेचने के आरोप लगे थे। लेकिन ना तो आम आदमी पार्टी को इन आरोपों की परवाह है और ना उन उम्मीदवारों को जिनके नाम पर ये पूरा विवाद खड़ा हुआ है।


सवाल उठता है कि क्या वाकई राज्यसभा सीट बेचने जैसे आरोपों से भी आम आदमी पार्टी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा? क्या ये मान लेना सही होगा कि कुमार विश्वास का हश्र देखने के बाद पार्टी के भीतर का असंतोष भी दब जाएगा? इसके साथ ये सवाल भी खड़ा होता है कि क्या राजनीति में इमानदारी और पारदर्शिता सिर्फ दिखाने के दांत हैं!