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आवाज़ अड्डा: कितनी प्रासंगिक हैं खाप पंचायतें!

प्रकाशित Wed, 07, 2018 पर 10:32  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों को एक बार फिर जबर्दस्त फटकार लगाई है। ऑनर किलिंग के खिलाफ दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो अपनी मर्जी से शादी करने वाले वयस्क जोड़ों को खाप पंचायतों के कहर से बचाए। कोर्ट ने खाप पंचायतों के बारे में कहा है कि वो सही-गलत का फैसला करने वाली स्वयंभू संस्थाएं ना बनें। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट खाप पंचायतों को गैरकानूनी घोषित कर चुका है। ऑनर किलिंग से लेकर रेप की घटनाएं कम करने के लए चाउमीन खाने पर रोक जैसे खाप पंचायतों के ऊटपटांग फैसले आए दिन सुर्खियां बनाते रहते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने जो कड़ा रुख दिखाया है, तो क्या उसके बाद खाप पंचायतों की सोच में बदलाव आएगा?


सुप्रीम कोर्ट को नहीं लगता कि खाप पंचायतों का बना रहना जरूरी है। ऑनर किलिंग के खिलाफ एक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई के दौरान खाप पंचायतों की तरफ से ये दलील दी गई कि खाप पंचायतें अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को बढ़ावा देती हैं। खापों को सिर्फ समान गोत्र के दो लोगों की शादी पर ऐतराज है। एक गोत्र में विवाह को विज्ञान भी सही नहीं मानता और हिंदू मैरेज एक्ट में भी सपिंड विवाह की मनाही। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उसे सपिंड या ग्रोत्र से मतलब नहीं है। अपनी मर्जी से शादी करने वाले दो वयस्कों के बीच कोई नहीं आ सकता, ना  समाज, ना माता पिता और ना पंचायतें। ध्यान देने की बात है कि खाप पंचायतों के पास ज्यादातर शादी ब्याह के मामले आते हैं। ऐसे में खाप पंचायतों के अस्तित्व पर सवाल उठना लाजमी है। लेकिन खाप पंचायतों का तर्क है कि ये एक सामाजिक व्यवस्था है जिसे खत्म कर देने से ना सिर्फ गांव-घर में माहौल बिगड़ेगा, बल्कि कोर्ट में मुकदमों की संख्या भी बढ़ेगी क्योंकि अभी बहुत से मामले खाप पंचायतों में ही निपटा दिए जाते हैं।


सवाल उठता है कि क्या खाप पंचायतें हमारी सामाजिक व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं और इनका बना रहना जरूरी है? अगर ऐसा है तो फिर खापों में कानून से सीधी टक्कर लेने वाले फैसले क्यों किए जाते हैं? बदलते वक्त के साथ क्या खाप पंचायतों की प्रासंगिकता खत्म हो गई है? इन्ही सवालों पर आधारित है आवाज़ अड्डा।