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ब्रांड बाजारः फिल्मों का लोगों पर असर

प्रकाशित Sat, 10, 2018 पर 13:36  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

इस हफ्ते रिलीज हुई है अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन। इस फिल्म की कहानी ने हमें ये सोचने पर मजबूर किया है कि देश की बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों ने सैनिटरी हाइजिन जैसी बड़ी समस्या को हल करने की दिशा में अब तक क्या काम किया है।


करीब 3 दशक पहले हमारे देश में व्हिसपर और केयरफ्री जैसे बड़े सैनिटरी नैपकीन ब्रांड्स ने कदम रखा जिससे सैनिटरी हाइजिन में बड़ा बदलाव आया। जागरुकता की कमी के चलते इतने सालों बाद भी केवल चंद प्रतिशत महिलाएं ही इन पैड का इस्तेमाल करती हैं। पैडमैन जैसी फिल्म इस माहौल में बदलाव ला सकती है और कितना बढ़ा है देश का सैनिटरी नैपकीन का बाजार आइए जानते हैं।


अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर स्टारर पैडमैन कहानी है अरुणाचलम मुरुगनाथम की जिन्होंने महिलाओं के लिए किफायती सैनिटरी नैपकीन बनाने की शुरुआत की। प्रॉक्टर एंड गैंबल और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कंपनियां सैनिटरी नैपकीन को भारतीय बाजार में ले आई, लेकिन ये पैड्स काफी महंगे हैं जो आम और खासकर ग्रामीण महिलाओं की जेब पर भारी पड़ते हैं। ऐसे में अरुणाचलम मुरुगनाथम जैसे आंत्रप्रेन्योर ने किफायती सैनिटरी नैपकीन बनाने की तकनीक ढूंढ़ी और इसे देश के हर कोने में ले जाने की मुहिम छेड़ी।


अरुणाचलम मुरुगनाथम ने किफायती सैनिटरी पैड बनाने की मशीन बनाई और महिलाओं के बीच माहवारी से जुड़ी स्वच्छता का प्रसार किया। अरुणाचलम मुरुगनाथम की मिनी मशीन से बने पैड बाजार में मौजूद बडे ब्रांड के मुकाबले एक तिहाई कीमत में बनते हैं। ये मशीनें आज 23 राज्यों में लगाई गई हैं। आगे चलकर दुनिया के 106 देशों मे इसे फैलाने का अरुणाचलम मुरुगनाथम का प्लान है। इस फिल्म का किरदार लक्ष्मी प्रसाद भी अरुणाचलम मुरुगनाथम के प्रेरणादायी कहानी पर आधारित है।


बाजार में सैनिटरी नैपकीन की मौजूदगी इतने सालों से है लेकिन किसी भी ब्रांड ने इससे जुड़े स्वच्छता के मुद्दे को उठाया नहीं जबकि इन कंपनियों ने ब्रांड प्रमोशन में  हाथ कैसे धोते हैं से लेकर दांत किस तरह से ब्रश करते हैं जैसी बातों पर कैंपेन बनाए। लेकिन सैनिटरी नैपकीन के क्या मायने हैं और वो किस तरह से महिलाओं की मदद कर सकता है इस पर किसी भी ब्रांड ने अब तक कोई एड नहीं बनाया। हाल फिलहाल में कुछ चंद ब्रांड ने सोशल मीडिया पर छोटे स्तर पर कैंपेन जरूर शुरू किया जो आम ग्राहकों तक पहुंच पाए ऐसी आसान भाषा में नहीं बने हैं।


और तो और ब्रांड का इस प्रोडक्ट से जुड़े टैबू को दूर मिटाना भी अब जरूरी हो चुका है। आज भी महिलाओं को माहवारी के समय छूत-अछूत की परंपरा जारी है। इसके बारे में बात करने में हिचकिचाहट आम है। इतने सालों बाद भी केवल व्हिसपर ने ही टच दि पिकल नाम का कैंपेन लॉन्च किया है जो माहवारी से जुडे टैबू को हटाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।


बडे ब्रांड के साथ-साथ आंत्रप्रेन्योर, एनजीओ, स्कूल, कॉलेज, विज्ञापन, सोशल मीडिया जैसे हर मुमकिन प्लेटफॉर्म के जरिए इस मैसेज को फैलाना जरूरी है। शर्म का पर्दा हटाकर स्वच्छता की ओर कदम बढ़ाने के लिए सबको आगे आने की जरूरत है।