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आवाज़ अड्डा: पेट्रोल, डीजल पर घिरी बीजेपी!

प्रकाशित Thu, 12, 2018 पर 08:17  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पेट्रोल, डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पेट्रोल मुंबई में 81 रुपये और दिल्ली में 74 रुपये को पार कर चुका है। पेट्रोल, डीजल की कीमतें 2010 से ही सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं। लेकिन पेट्रोल आज आम आदमी की जरूरत है और पेट्रोल की महंगाई बाकी चीजों की महंगाई भी बढ़ाती है। इसीलिए पेट्रोल, डीजल की कीमत चुनावी राजनीति में पसंदीदा मुद्दा रही हैं। शायद यही वजह है कि अभी जब कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई को छू रही हैं तो सरकार ऑइल मार्केटिंग कंपनियों को कीमतें नियंत्रित करने का दबाव बना रही है। खबर है कि सरकार ने कंपनियों से पेट्रोल, डीजल पर 1 रुपये की राहत देने को कहा है। जबकि कंपनियां इस तरह के किसी भी निर्देश से साफ इनकार कर रही है। ऐसे में पेट्रोल, डीजल की कीमतें, उसपर पक्ष-विपक्ष की राजनीति और इसमें सरकार की भूमिका अपने आप में एक तिलिस्म बन गई है।


पेट्रोल डीजल की कीमतें और उसपर मोदी सरकार की पसोपेश एक नमूना है कि कैसे सत्ताधारी पार्टी को वही राजनीति आ घेरती है जिसके बीज उसने विपक्ष में रहते हुए बोए थे। 2012-13 में जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतें 125 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गईं थीं और पेट्रोल 70 रुपये बिक रहा था तब विपक्ष में बैठी बीजेपी ने आसमान सिर पर उठा लिया था लेकिन फरवरी 2016 में जब कच्चा तेल करीब 30 डालर प्रति बैरल तक नीचे गिरा तो पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ बल्कि सरकार ने 9 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर कंज्यूमर का हिस्सा खींच लिया। अब जब पेट्रोल 80 रुपये को पार कर चुका है तो सरकार के माथे पर बल पड़ रहे हैं और तेल कंपनियों को कीमतों को काबू में रखने को कहा जा रहा है। लेकिन कीमत निर्धारण के मामले में स्वतंत्र हो चुकीं ऑयल मार्केटिंग कंपनियां इस तरह के किसी भी निर्देश से इनकार कर रही हैं।


आजकल जब भी पेट्रोल, डीजल की महंगाई की बात आती है तो सरकार कहती है कि जीएसटी के दायरे में आने के बाद कीमतें कम हो जाएंगी। लेकिन सवाल उठता है कि लोगों को इसके लिए कब तक इंतजार करना होगा? 95 फीसदी बाजार पर सरकारी कंपनियों का कब्जा है और पेट्रोल की कीमत का 48 फीसदी से ज्यादा और डीजल में लगभग 39 फीसदी केंद्र और राज्य सरकारों को टैक्स के रूप में जाता है। यानि सरकार मुनाफा भी लेती है और टैक्स से मोटी कमाई भी करती है। ऐसे में क्या सरकार को चाहिए कि वो टैक्स घटाकर पेट्रोल, डीजल की कीमतें कम करे और जनता को राहत दे? इसी सवाल पर आधारित है आवाज़ अड्डा।