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आवाज़ अड्डा: मीडिया पर सोशल मीडिया के जरिए हमला!

प्रकाशित Tue, 17, 2018 पर 08:23  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अजीब सा कोलाहल है। बहस मुबाहिसे गली नुक्कड़ पर कम, सोशल मीडिया और टीवी स्टूडियो में ज्यादा हो रहे हैं। बहस से किसी को गुरेज क्यों हो एक जीवंत लोकतंत्र की ये अच्छी निशानी है। लेकिन डर तब लगता है जब हर बहस के साथ हम संदेह पैदा करने की कोशिश करें। आजकल ज्यादातर मौकों पर यही हो रहा है। जो तथ्यों और तर्कों में फंसता है, वो उससे निकलने के लिए आपकी सवाल उठाने की नीयत पर ही सवाल उठाने लगत है। ताजा मिसाल है बलात्कार के दो मामलों पर छिड़ी बहस। ऐसे अपराधियों के बचाव में भी भीड़ जुट रही है और सोशल मीडिया पर भी लोग अपने तर्क ले कर आ रहे हैं। आप कठुआ या उन्नाव के रेप का मामला उठा रहे हैं तो आपने सासाराम की बात क्यों नहीं की, आपने असम में हुए बलात्कार पर सवाल क्यों नहीं उठाया। सवाल के बदले सवाल यानी बहस करनेवाले की विश्वसनीयता को ही संदेह के घेरे में डाल दो।


सोशल मीडिया में साफ साफ गुटों में बंटे लोगों के बीच ये बहस किसी नतीजे पर न पहुंचे तो भी हर कोई अपने टारगेट ग्रुप तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हो जाता है। लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया की बहसें भी ऐसे ही सवालों के जवाब में खड़े किए गए सवालों में गुम हो जाती है। आखिर इसकी वजह क्या है। क्या हर पक्ष जानबूझ कर दुविधा का माहौल बनाए रखना चाहता है ताकि एक बड़ा तबका जिसने कोई लाइन न ली है वो किसी नतीजे पर ना पहुंचे, वो कनफ्यूज हो जाए। क्या हमारी आम जिंदगी में संवाद का स्तर इतना गिरा है इसी लिए सच्चाई को स्वीकार करने का साहस नेताओं में, आम लोगों में नहीं रह गई है। या हमारा समाज गलती माननेवालों को भी सजा सुनाने के लिए तैयार रहता है। माफ करने के लिए नहीं, इसका ये नतीजा है।


विद्वानों ने इस प्रवृत्ति को दिया व्हाटअबाउटिज्म नाम दिया है। ये विरोधी को चुप कराने के लिए प्रोपेगंडा है। सोवियत संघ के संदर्भ में ये नाम दिया गया। सोवियत संघ के दौर में पश्चिमी देशों की आलोचना के खिलाफ इसका खूब इस्तेमाल हुआ। हाल ताज में देखें तो जब अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप पर आरोप लगे तो आरोप के जवाब में हिलेरी, ओबामा की आलोचना की गई। मनोविज्ञान इसे आत्मग्लानि से जोड़ता है जो बचाव के तरीके खोज पाने में विफलता व्यक्त करता है। आवाज़ अड्डा में यहां इसी पर हो रही है बड़ी बहस।