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आवाज-अड्डा: रमजान में युद्धविराम, क्या घटेगा घाटी में कोहराम!

प्रकाशित Fri, 11, 2018 पर 08:05  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती चाहती हैं कि रमजान और अमरनाथ यात्रा को देखते हुए केंद्र सरकार एकतरफा युद्ध विराम का एलान करे। वो चाहती हैं कि मोदी सरकार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह सोचे। वाजपेयी ने 2000 में रमजान के दौरान 1 महीने का सीजफायर किया था और बाद में उसे बढ़ाकर मई 2001 तक जारी रखा गया। वैसे उस सीजफायर की सफलता पर विद्वानों में बहुत स्पष्ट राय नहीं है और प्रधानमंत्री मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी के तेवर भी एक जैसे नहीं हैं। इसके अलावा आर्मी चीफ बिपिन रावत ने कहा है कि एकतरफा सीजफायर जैसा फैसला घातक साबित होगा। 2016 जुलाई में बुरहान वानी की मौत के बाद से घाटी के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। ऐसे में एकतरफा सीजफायर की मांग ने कई सवालों को जन्म दे दिया है।


घाटी के हालात पर चर्चा के लिए बुलाए गई ऑल पार्टी मीटिंग 4 घंटे तक चली। बैठक में समस्या के राजनीतिक समाधान समेत कई मुद्दों पर चर्चा हुई। विपक्षी पार्टियों ने कहा कि बीजेपी-पीडीपी सरकार बनाते वक्त जो एजेंडा तय किया था उसे पूरा नहीं किया गया। महबूबा मुफ्ती ने मीडिया को बताया कि बैठक में शामिल तमाम पार्टियों की राय है कि केंद्र सरकार कश्मीर में रमजान और अमरनाथ यात्रा के दौरान एकतरफा सीजफायर का एलान करे।


बैठक में ये भी तय हुआ है कि कश्मीर का एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी राय रखेगा। सर्वदलीय बैठक में बीजेपी के प्रतिनिधि भी शामिल थे और राज्य के डिप्टी सीएम कविंद्र गुप्ता ने भी महबूबा की बातों से सहमति जताई है। लेकिन पार्टी की राज्य इकाई ने कहा है कि इस वक्त सीजफायर से फायदे की जगह नुकसान होगा। कश्मीर को लेकर मुखर रहे बीजेपी नेता सुब्रमणियन स्वामी कहते हैं कि महबूबा मुफ्ती सीजफायर की मांग करके अपनी नाकामी छिपा रही हैं।


सेना प्रमुख बिपिन रावत ने भी कहा है कि एकतरफा सीजफायर के एलान से उल्टा नुकसान होगा क्योंकि इस बार की गारंटी नहीं है कि आतंकवादी सेना पर हमले बंद कर देंगे। सवाल उठता है कि क्या एकतरफा सीजफायर से घाटी के हालात सामान्य बनाने में मदद मिलेगी? या वाकई महबूबा मुफ्ती और कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां सीजफायर की मांग कर अपनी नाकामी छिपा रही हैं? ऐसे में कश्मीर शांति के लिए अगला कदम क्या होना चाहिए? इन्ही सवालों पर आधारित है आवाज़ अड्डा।