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नियामकों के कदमों का निवेशकों पर प्रभाव

प्रकाशित Tue, 04, 2011 पर 15:55  |  स्रोत : Hindi.in.com

4 जनवरी 2011
Moneycontrol.com



पिछले कुछ सालों से बाजार नियामकों ने निवेश के बाजार में ज्यादा पारदर्शिता लाने के प्रयास किए हैं। इनमें से ज्यादातर प्रयास निवेशकों के लिए काफी सकारात्मक साबित हुए हैं।



इसको जरिए उन व्यक्तिगत निवेशकों को लाभ मिला है जो बीमा माध्यमों के जरिए इक्विटी बाजार में पैसा लगा रहे थे, साथ ही यूलिप, म्यूचुअल फंड और (पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सेवाओं) पीएमएस कारोबार में भी लाभकारी बदलाव देखने को मिले हैं। नियामकों द्वारा उठाए गए कदमों से निवेशकों को मिले खास फायदों में से कुछ इस प्रकार हैं-


•यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान को नियंत्रित करना

•पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सेवाओं के नए दिशानिर्देश जारी करना

•म्यूचुअल फंडों से एंट्री लोड हटाना

यूलिप बिक्री को नियंत्रित करना



यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) एक व्यवस्थित बीमा+ निवेश योजना है। इसके तहत निवेशकों को निवेश के वर्तमान कीमत के हिसाब से पॉलिसी की वैल्यू बदलती रहती है। इसलिए यूलिप में लंबी अवधि के लिए निवेश करने की सलाह दी जाती है।

          बदलाव और प्रभाव

3 साल के लॉक-इन को बढ़ाकर 5 साल किया गया

 यूलिप के बुनियादी एसेट इक्विटी होते हैं। इक्विटी कैसा प्रदर्शन कर रही हैं इसे सिर्फ मध्यम से लंबी अवधि की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। इसलिए यूलिप के लॉक-इन अवधि को बढ़ाकर ही इसे अच्छी तरह परखा जा सकता है। लॉक-इन बढ़ाने से निवेशकों के यूलिप उत्पाद पर भरोसे भी बढ़ेगा और इसकी साख को और निश्चित बनाएगा।


शुल्क को बराबर रूप से बांटना

पहले पॉलिसी लेने के शुरूआती 3-5 सालों में ही अधिकांश शुल्क वसूल लिये जाते थे जिसके चलते पॉलिसी के अधिकतम फायदे तभी मिल पाते थे जब ग्राहक लगातार 10 साल तक प्रीमियम देते थे। शुल्क को समान रूप से बांटने के बदलाव के फायदा के रूप में प्रीमियम के अधिकांश प्रतिशत का भुगतान आरंभिक सालों में करने के बाद भी कम्पाउडिंग का फायदा मिलता है।


सम एश्योर्ड में बढ़ोतरी

यूलिप को निवेश से ज्यादा इंश्योरेंस आधारित योजना बनाने के फोकस का सबसे ज्यादा फायदा सम एश्योर्ड बढ़ने के रूप में मिला है। पहले के 5 फीसदी की तुलना में अब ग्राहकों को प्रीमियम की 10 फीसदी राशि का सम एश्योर्ड मिल रहा है।


पेंशन योजनाओं पर 4.5 फीसदी रिटर्न

बाजार के उतार-चढ़ाव और बीमा कंपनियों के शुल्क कटौती खासकर बुजुर्ग निवेशकों के हितों को सुरक्षित करने के क्रम में पेंशन योजनाओं पर 4.5 फीसदी रिटर्न की सुविधा दी गई है।


सरेंडर शुल्क में बदलाव

पहले कुछ बीमा कंपनियों ग्राहकों से बेबात के पॉलिसी सरेंडर शुल्क वसूला करती थीं। हालांकि अब कंपनियां सिर्फ आवश्यक शुल्क (कलाइंट एक्यूजीशन कॉस्ट) लेती हैं जो ग्राहक को बहुत भारी नही पड़ती है। इस सुविधा के बाद अगर किसी कारणवश ग्राहक को पॉलिसी सरेंडर करनी हो तो भी वह अधिकतम सम एश्योर्ड हासिल कर सकता है।


इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य बीमा पॉलिसियों को ज्यादा पारदर्शी बनाना और सभी पॉलिसीधारकों और बीमित व्यक्तियों के हितों-अधिकारों को एक समान करना है। इसके फलस्वरूप बीमा उत्पादों की मिस-सेलिंग पर रोक लगाने में मदद मिली है।
यहां इन बदलावों के पीछे के उद्देश्यों के बारे में बताया गया है-



• लंबे समय के लिए निवेशकों का रुझान बढ़ाना

• यूलिप की मिस-सेलिंग पर रोक

• इंश्योरेंस कवर बढ़ाना, इससे निवेश की बजाए लाइफ-कवर को अधिक महत्ता मिली

• बुजुर्गों के लिए जोखिम को कम करना



पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज के लिए दिशानिर्देश

          बदलाव और प्रभाव


न्यूनतम निवेश सीमा को 5 लाख करना


सेबी के नियमों के मुताबिक वर्तमान में पीएमएस खाता खोलने के लिए कम से कम 5 लाख रुपये की आवश्यकता होती है। इससे पहले अगर ग्राहक 5 लाख से कम राशि पर भी पीएमएस खाता चाहता था तो उसका आवेदन मंजूर कर लिया जाता था।



पोर्टफोलियो मैनेजर के लिए वॉटरमार्क सिद्धांत का पालन करने की बाध्यता

किसी पोर्टफोलियो को प्रबंधित करने पर मुनाफे की राशि को निर्धारित करने की प्रक्रिया में सेबी ने पीएम को ऊंचे सिद्धातों का पालन करने के निर्देश दिए हैं। इस नियम के तहत कहा गया है कि शुल्क केवल उतने ही मुनाफे पर लिया जाए जो पिछली बार के मुनाफे के अतिरिक्त हासिल किया गया हो।



उदाहरणः अगर किसी निवेशक ने 10 लाख रुपये निवेश किए और 1 साल बाद उसके निवेश की राशि बढ़कर 12 लाख हो जाती है तो पोर्टफोलियो मैनेजर को सिर्फ अतिरिक्त 2 लाख रुपये के रिटर्न पर ही फीस मिलेगी। मान लीजिए इसके अगले साल में निवेश पर मुनाफा बढ़कर 14 लाख रुपये हो जाता है तो पीएम को 12 लाख रुपये के बाद बढ़ी हुई पूंजी पर ही शुल्क वसूलने की सुविधा होगी ना कि पूरे 14 लाख पर।



इसके जरिए सेबी ने निवेशकों के हितों को अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास किए हैं। पोर्टफोलियो मैनेजरों द्वारा वसूली जा रही फीस को तर्कसंगत बनाने के फायदे निवेशकों को मिले हैं। नए दिशानिर्देशों के जरिए सुनिश्चित किया गया है कि अगर ग्राहक को निवेश से ज्यादा फायदा मिलता है तो उसमें से अधिकांश भाग पोर्टफोलियो मैनेजर की फीस के रूप में ही ना चला जाए।



म्यूचुअल फंडों से एंट्री लोड हटाना

सेबी ने म्यूचुअल फंडों पर से एंट्री लोड वसूलने पर बैन लगा दिया है। इसके जरिए निश्चित तौर पर म्यूचुअल फंड कारोबार को चलाने के तरीकों में बदलाव देखा जाएगा। अब निवेशक लंबी अवधि के लिए फंडों में निवेश कर पाएंगे। माना जा रहा है कि एंट्री लोड हटने जैसे बदलावों के बाद नए फंड ऑफर (एनएफओ) की बेतहाशा आमद में कमी आएगी और मौजूदा योजनाओं के प्रदर्शन में बेहतरी देखे जाने की उम्मीद की जा सकती है।


                प्रभाव



• ऊंचे रिटर्न



• नए फंड ऑफर में कमी



• म्यूचुअल फंड सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार



आशा की जा रही है कि इन अहम नियामक बदलावों के बाद बीमा और म्यूचुअल फंड उद्योग में ग्राहकों के हितों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसके अलावा लंबी अवधि के लिए निवेश करने वालों को अधिक पारदर्शी सुविधाओं का फायदा मिल पाएगा। साथ ही निवेश के अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन करने की तरफ बढ़ने का फायदा समूचे निवेश जगत को मिलेगा।


 


ये लेख राइट होराइजन के सीईओ और संस्थापक अनिल रेगो  द्वारा लिखा गया है।