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जानिए क्या वाकई बेहतर हैं नए यूलिप प्लान

प्रकाशित Sat, 12, 2011 पर 15:39  |  स्रोत : Moneycontrol.com

12 फरवरी 2011



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2010 की प्रथम छः माही में भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड (सेबी) और भारतीय बीमा नियामक प्राधिकरण (इरडा) में विवाद एवं अंतिम छःमाही में इरडा द्वारा यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी (यूलिप) के संबंध में नए नियमों के ऐलान से यूलिप प्लान काफी चर्चा में रहे हैं।



वैसे भी टैक्स बचत के लिए यूलिप काफी लोकप्रिय साधन रहा है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2009 -10 में जीवन बीमा कंपनियों ने यूलिप के तहत 1,15,,521 करोड़ रुपए का प्रीमियम एकत्रित किया था जो कि जीवन बीमा द्वारा एकत्रित कुल प्रीमियम का 43.5% था। इन प्लान की लोकप्रियता का प्रमुख कारण लुभावने विज्ञापन एवं एजेंटों को मिलने वाला तगड़ा कमीशन रहा है, न कि निवेशकों का हित।



बहरहाल इरडा ने इंश्योरेंस कंपनियों की नकेल कसते हुए 1 सितंबर से यूलिप के संबंध में नए नियम लागू किए हैं। नए नियम लागू करने के पीछे इरडा का उद्देश्य यूलिप प्लान को निवेशकों के हित में लंबी अवधि का उत्पाद बनाना, ज्यादा बीमा कवर प्रदान करना एवं इन प्लान के खर्चे कम करना है। तो आइए, जानें क्या यूलिप के नए नियम वाकई निवेशकों के हित में हैं?



  सितंबर 2010 से लागू नए नियम



1. लॉक-इन : पहले इन प्लान में लॉक-इन 3 वर्षों का था जिसे बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया गया है। इसके कारण अब पाँच वर्ष पूर्व इन प्लान से राशि नहीं निकाली जा सकती है।



2. बीमा कवर : पहले न्यूनतम बीमा वार्षिक प्रीमियम का 5 गुना था, जिसे नए नियमों के तहत 45 वर्ष से कम आयु के लिए 10 गुना एवं 45 वर्ष से अधिक आयु के लिए कम से कम 7 गुना कर दिया गया है। इससे अब निवेशकों को अधिक बीमा कवर मिल सकेगा।



3. खर्चे : पहले इस प्लान में प्रथम वर्ष के खर्चे बहुत अधिक थे, अब नए नियमों के तहत लॉक-इन पीरियड में खर्चों को बराबर रखने का प्रावधान किया गया है। इससे शुरुआती वर्षों में यूनिट्स में अधिक राशि का आवंटन हो सकेगा एवं एजेंटों के कमीशन में भी कमी हो सकेगी।



4. ग्रॉस एवं नेट यिल्ड में अंतर : मैच्योरिटी की ग्रॉस एवं नेट यिल्ड में कोई बदलाव नहीं किया गया है। 10 वर्ष से कम वाली पॉलिसी पर 3% और 10 वर्ष से अधिक की पॉलिसी पर 2.25% का कैप (लीमिट) यथावत रखा गया है। हालाँकि मैच्योरिटी पूर्व निकासी की स्थिति में ग्रॉस एवं यिल्ड पर 5 वर्षों में 4% से लेकर 15 वर्ष में 2.25% का कैप लगा दिया गया है। इससे मैच्योरिटी के पूर्व निकासी की स्थिति में पहले से अधिक राशि मिल सकेगी।



5. सरेंडर चार्जेस : पहले इस पर कोई कैप नहीं था। नए नियमों के तहत प्रत्येक वर्ष सरेंडर चार्ज कम होता जाएगा एवं 5 वर्ष के बाद कोई सरेंडर चार्ज नहीं लिया जा सकेगा।



उपरोक्त नियमों को देखें तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि पहले से नए यूलिप प्लान बेहतर हो गए हैं, परंतु इंश्योरेंस कंपनियों ने इन नियमों के तहत अपनी आय बढ़ाने का रास्ता मार्टेलिटी चार्ज बढ़ाकर निकाल लिया है।



जहाँ एक ओर लाइफ एक्सपेक्टेंसी बड़ी है जिससे मार्टेलिटी चार्ज कम होना चाहिए था लेकिन नए नियमों के बाद यूलिप में अधिकतर इंश्योरेंस कंपनियों ने मार्टेलिटी चार्ज बढ़ा दिए हैं। नए नियमों के बावजूद यह प्लान आकर्षक नहीं हो पाए हैं। बहरहाल हम ये जानें कि नए परिवेश में ये प्लान किन दशा में आपके लिए बेहतर हो सकते हैं-



* 10 वर्षों से अधिक की निवेश योजना बना रहे हैं?

* आपके पास पूर्व से ही लंबी अवधि के लिए पर्याप्त इंश्योरेंस कवर है एवं आप केवल मध्यम अवधि के लक्ष्यों के लिए कवर बढ़ाना चाहते हैं।

* आप बीमा एवं निवेश को पृथक रूप से करने में सक्षम नहीं हैं।

* आप विभिन्न निवेश साधनों की समझ नहीं रखते हैं।

* आप बाजार के उतार-चढ़ाव में जोखिम कम करने के लिए डेब्ट से इक्विटी या विभिन्न फंड विकल्पों में बिना टैक्स भार के स्वीचिंग करना चाहते हैं।



नए परिवेश में भी आपके लिए बेहतर यही होगा कि आप यूलिप प्लान से बचें एवं जीवन बीमा के लिए टर्म प्लान लें और निवेश पृथक रूप से अपनी जोखिम क्षमता अनुसार अलग-अलग निवेश साधनों में करें, जिससे कम खर्च में आप अधिक बीमा कवर प्राप्त कर सकेंगे, साथ ही निवेश को लंबी अवधि तक करने की बाध्यता से छुटकारा, निवेश पर अधिक रिटर्न एवं जरूरत पड़ने पर निवेश को भुना भी सकेंगे।



कई बार हमने देखा है कि लंबी बाध्यता के कारण एक तरफ तो व्यक्ति ऊँची ब्याज दर पर लोन लेता है एवं दूसरी तरफ उसे मजबूरीवश इस तरह के कम रिटर्न वाले साधनों में निवेश जारी रखना पड़ता है, जिससे जरूरत पड़ने पर अपना पैसा ही अपने काम नहीं आ पाता है। कई बार ऐसे में व्यक्ति प्लान बंद करने तक की योजना बना लेता है, जिससे जीवन में जिस समय सबसे अधिक इंश्योरेंस की आवश्यकता होती है, उस समय व्यक्ति के पास इंश्योरेंस ही नहीं रह जाता है।



यूलिप से आपको इसलिए भी बचना चाहिए कि यदि आपके द्वारा चुने गए यूलिप का फंड प्रदर्शन अच्छा नहीं है तो चाहकर भी आप इसे बदल नहीं सकेंगे।



अतः यदि आप टैक्स बचत के लिए यूलिप प्लान लेने की योजना बना रहे हैं तो सोच-समझकर ही निर्णय लें। कहीं ऐसा न हो कि बाद में आपको पछताना पड़े?



यह लेख अरिहंत कैपिटल मार्केट के चीफ फाइनेंशियल प्लानर उमेश राठी ने लिखा है। उमेश राठी से umesh.rathi@arihantcapital.com पर संपर्क किया जा सकता है।