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यूलिप बनाम ट्रेडिशनल प्लानः यूलिप हैं बेहतर

प्रकाशित Mon, 14, 2011 पर 14:05  |  स्रोत : Moneycontrol.com

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14 मार्च 2011



पिछले हफ्ते मैं हर हफ्ते की तरह मॉल घूमने गया था और वहां मेरी मुलाकात अपने पुरान दोस्त से हुई। मेरा दोस्त ब्रोकिंग हाउस में काम करता है जो भारत के सबसे बड़े ब्रोकिंग हाउस में से एक है।



मैं जानता था कि वो ऐसे डेरेवेटिव स्ट्रक्चर्ड उत्पादों के बारे में जानता है जिनकी जानकारी आम आदमी के पास होना काफी मुश्किल है। मुझे लगा कि काफी समय से मैं जो जानकारी लेना चाहता था अब मैं अपने दोस्त से वो सारी सूचना ले पाउंगा।



हमारी बातों के दौरान हम टैक्स बचाने के मुद्दे पर भी पहुंचे। लेकिन मुझे हैरानी हुई जब मैने देखा कि मजबूत वित्तीय स्थिति और विभिन्न जटिल उत्पादों की जानकारी होने के बावजूद वो ऐसे आर्थिक उत्पादों की खोज कर रहा था जिनमें निवेश के जरिए वो सेक्शन 80 सी के तहत टैक्स बचा सके।



उसके जैसे पेशेवर आदमी को ये काम बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं था। मेरे दोस्त के मुताबिक उसके इंश्योरेंस एजेंट ने कुछ ऐसे प्लान बताए जो टैक्स बचाने में काम आ सकते थे।



इंश्योरेंस एजेंट ने मेरे दोस्त को एन्डोमेंट प्लान खरीदने की सलाह दी जिसका सालाना प्रीमियम 1 लाख रुपया था। अचानक मुझे मेरे एक और दोस्त की याद आई। उसने भी टैक्स बचाने की योजना के तहत 1 लाख रुपये सालाना प्रीमियम का एक यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान) खरीदा था।



इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि इंश्योरेंस एजेंट यूलिप की बजाए कम रिटर्न देने वाले एन्डोमेंट प्लान बेचने पर जोर क्यों दे रहा है। जबकि नई गाइडलाइंस आने के बाद यूलिप नए अवतार में काफी आकर्षक हो गए हैं।



सामान्य ट्रेडिशनल प्लान सालाना 4.5 से 5.5 फीसदी के करीब रिटर्न दे पाते हैं जो लंबे समय में महंगाई को हराने में सक्षम नहीं होंगे। वहीं बदलाव के बाद यूलिप काफी बेहतर हो गए हैं और लंबी अवधि में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। देखा जाए तो ये ट्रेडिशनल प्लान कुछ ऐसे यूलिप से भी बेकार हैं जो नई गाइडलाइंस आने से पहले मिलते थे।



सितम्बर 2010 से पहले इश्योरेंस एजेंट के लिए यूलिप पसंदीदा उत्पादों में से एक थे। यूलिप के साथ भारी खर्चे होते थे जिसका मतलब है उन एजेंटों को भारी कमीशन जो ये उत्पाद बेचते थे। जीवन बीमा कंपनियों के नए कारोबार का 70 फीसदी यूलिप की बिक्री से आता था। पहले साल के प्रीमियम का 60-70 फीसदी हिस्सा एजेंट को कमीशन के रुप में मिलता था। यूलिप पॉलिसी के एडमिनिस्ट्रेशन शुल्क ज्यादा थे और इसमें पारदर्शिता कम थी। इन सब कारणों से यूलिप एक बहुत ही खराब निवेश विकल्प बन गया था।



इसके बाद आईआरडीए (इंश्योरेंस रेगुलेटरी डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने नए दिशानिर्देश जारी किेए और इसके जरिए यूलिप पर लगने वाले सभी खर्चों को नियंत्रित किया गया। साथ ही प्रोडक्ट ब्रोशर (विवरणिका) में सारी जानकारी देने के नियम के जरिए यूलिप पॉलिसी को अधिक पारदर्शी बनाया गया। इन सब सुधारों के जरिए यूलिप के पूरे ढांचे में बदलाव किया गया और इसे ग्राहकों के लिए ज्यादा मददगार और आसान बनाया गया।



नए गाइडलाइंस के बाद यूलिप बिक्री पर एजेंटों के कमीशन में भारी कमी आई और परिणामस्वरुप इंश्योरेंस एजेंटों के लिए यूलिप आकर्षक विकल्प नहीं रह गए हैं।



नए दिशानिर्देशों के बाद इंश्योरेस कंपनियों के लिए नवंबर 2010 पिछले 4 सालों में सबसे ज्यादा खराब साल साबित हुआ। नए बिजनेस के मामले में नवंबर 2009 की तुलना में नवंबर 2010 में बीमा कंपनियों ने 20 फीसदी कम कारोबार किया। बीमा कंपनियों में दिग्गज बजाज आलियांज, एसबीआई लाइफ, एचडीएफसी स्टेंडर्ड लाइफ और रिलायंस लाइफ के कारोबार को काफी नुकसान पहुंचा। वहीं बीमा कारोबार की नई कंपनियों ने 2009 में ज्यादा कारोबारी बढ़त हासिल नहीं की।



यूलिप के भविष्य को देखते हुए बीमा कंपनियों ने अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स को ट्रेडिशनल प्लान बेचने पर जोर देने को कहा। इसके पीछे ये वजह तो निश्चित नहीं थी कि ट्रेडिशनल प्लान अचानक यूलिप से बेहतर हो गए थे, बल्कि कंपनियां यूलिप की बजाए ट्रेडिशनल प्लान बेचने पर अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स को ज्यादा कमीशन देने का प्रस्ताव देने लगी थीं। अगली बार जब आपका इंश्योरेंस एजेंट आपको ट्रेडिशनल प्लान बेचने की कोशिश करे तो उससे इसके पीछे की सच्ची वजह जानें, जिससे आप जाल में फंसने से बच सकें।



अगर अभी भी आप 80 सी के तहत टैक्स बचाने के विकल्प ढूंढ रहे हैं तो जान लीजिए कि 15-20 साल के लंबे समय के लिए यूलिप सबसे बेहतर विकल्प में से एक हैं।



इस लेख के लेखक अभिषेक सिंह हैं जो अपना पैसा डॉटकॉम के हेड रिसर्च हैं। आप इनसे abhishek.singh @apnapaisa.com. पर संपर्क कर सकते हैं।