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फंडामेंटल विश्लेषणः कैसे करें शेयरों में निवेश

प्रकाशित Mon, 14, 2011 पर 14:57  |  स्रोत : Moneycontrol.com

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14 मार्च 2011



सामान्य निवेशक जो इक्विटी में निवेश की शुरुआत करना चाहते हैं आमतौर पर एसेट वर्ग में निवेश करना चाहते हैं लेकिन उन्हें विभिन्न बाजार सलाहकारों और विशेषज्ञों द्वारा काम में लाई जाने वाली टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली) का पता नहीं होता है।



इस जानकारी के अभाव में निवेशक सही फैसला लेने में चूक सकते हैं। विश्लेषण की वह शाखा जिसमें टर्मिनॉलॉजी का उपयोग होता है, उसे फंडामेंटल विश्लेषण कहा जाता है। यहां आपको ऐसे शब्दों की जानकारी दी जाएगी जिनके जरिए आपको निवेश के रास्ते पर चलने में काफी आसानी हो सकती है।



फंडामेटल विश्लेषण क्या है ?



फंडामेटल विश्लेषण के तहत किसी कंपनी की आर्थिक जानकारी को सम्मिलित किया जाता है, इसमें कंपनी के प्रबंधन, तुलनात्मक फायदे, भविष्य में कंपनी की विकास संभावनाएं आदि शामिल होता है।



सामान्य तौर पर कंपनी के ऐतिहासिक और वर्तमान वित्तीय आंकड़ों का अध्ययन होता है जिसके जरिए कंपनी के लक्ष्य और भविष्य के आउटलुक के बारे में जाना जा सकता है। इसमें वित्तीय विश्लेषण, औद्योगिक विश्लेषण और कंपनी का विश्लेषण शामिल होता है।



किस कंपनी में कितनी मजबूती है इसे जानने के लिए कंपनी के आर्थिक आंकड़ों जैसे आय, मुनाफा, घाटा और बैलेंस शीट पर नजर डालना जरूरी है। इन के जरिए हम कंपनी के आर्थिक प्रदर्शन को जांच सकते हैं। कंपनी की लिक्विडिटी की स्थिति और मुनाफे की संभावनाओं का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।



आइये जानते हैं कि किसी कंपनी के मुनाफे कमाने के अनुपात की संभावनाओं की गणना कैसे की जा सकती है। मुनाफे कमाने के अनुपात की जांच में हम मुख्य रूप से कंपनी के ऑपरेटिंग मार्जिन, शुद्ध मुनाफे का मार्जिन, ऐसेट पर रिटर्न की संभावना, इक्विटी पर रिटर्न की संभावना, प्रति शेयर कमाई (ईपीएस) और प्राइस अर्निंग (पीई) अनुपात पर ध्यान देते हैं।



ऑपरेटिंग मार्जिनः परिवर्तनशील उत्पादन लागत (जिसमें कच्चे माल की लागत भी शामिल है) वेतन आदि निकालने के बाद कंपनी के पास जो राजस्व बचता है उसे ऑपरेटिंग मार्जिन कहते हैं। इसके जरिए संकेत मिलते हैं कि समय-समय पर बदलने वाली लागत पर कंपनी का नियंत्रण है। किसी कंपनी को अपनी तयशुदा लागत जैसे कर्जों पर ब्याज आदि को चुकाने के लिए अच्छे ऑपरेटिंग मार्जिन की जरुरत होती है। कंपनी की कुल आय में से ऑपरेटिंग प्रॉफिट को भाग देने के बाद ऑपरेटिंग मार्जिन निकाला जाता है।



नेट प्रॉफिट मार्जिनः नेट प्रॉफिट मार्जिन के जरिए टैक्स चुकाने के बाद बचे कंपनी के मुनाफे को जाना जाता है। ये किसी कंपनी की कीमत निर्धारण की नीतियों की तरफ संकेत करती है।



रिटर्न ऑन ऐसेटः (आरओए) इसके जरिए निवेशकों को पता चलता है कि शुद्ध आय हासिल करने में कंपनी का प्रबंधन कितनी कुशलता से ऐसेट का उपयोग कर रहा है। जितना उच्चतम आरओए होगा उतना ही कंपनी के लिए बेहतर होगा क्योंकि इससे पता चलता है कि कंपनी कम निवेश से ज्यादा रिटर्न कमा पा रही है। कुल ऐसेट में से शुद्ध मुनाफे को भाग देने के बाद रिटर्न ऑन ऐसेट की गणना की जा सकती है।



रिटर्न ऑन इक्विटीः (आरओई) इसके जरिए पता चलता है कि कंपनी ने टोटल नेट वर्थ (शेयरों की पूंजी+ कैश रिजर्व और अधिभार) के अनुपात में कितना मुनाफा कमाया है। जिस कंपनी का आरओई उच्चतम होगा उस कंपनी की आंतरिक पूंजी पैदा करने की क्षमता उतनी ही ज्यादा होगी।



इक्विटी प्रति शेयरः (ईपीएस) वह भाग जो कंपनी के मुनाफे में से हरेक शेयरधारक को दिया जाता है। ये एक प्रकार से कंपनी के मुनाफे कमाने के अनुमान का दिशासूचक है। कंपनी की शुद्ध आय को आउटस्टेंडिंग शेयरों से भाग देने के बाद ईपीएस निकाली जाती है।



प्राइस अर्निंग रेश्योः (पी/ई) किसी कंपनी में निवेश करते समय ये सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक होता है। खासतौर पर जब आप इक्विटी में निवेश कर रहे हों। मुख्यतौर पर पीई के जरिए ये पता चलता है कि कंपनी की कमाई के आधार पर बाजार की रिटर्न देने की कितनी क्षमता है। कंपनी के शेयर के मौजूदा बाजार भाव से ईपीएस को भाग देने के बाद पीई निकाला जा सकता है।



उम्मीद करते हैं कि इस जानकारी के माध्यम से आप किसी शेयर का मूल्यांकन निकालने में सक्षम हो सकते हैं। साथ ही आपको इस बात की भी सलाह दी जाती है कि अगर आप खुद विशेषज्ञ नहीं हैं तो बिना उचित मार्गदर्शन के निवेश ना करें।