Facebook Pixel Code = /home/moneycontrol/commonstore/commonfiles/header_tag_manager.php
Moneycontrol » समाचार » बीमा

सबसे सही हेल्थ प्लान के लिए जरूरी 7 बातें

प्रकाशित Sat, 27, 2011 पर 16:16  |  स्रोत : Moneycontrol.com

27 अगस्त 2011

रुपीटॉक डॉटकॉम



फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर्स ऑफ कॉमर्स इन इंडिया( फिक्की) और इंश्योरेंस रेगुलेटर और डेवलपमेंट अथॉरिटी( इरडा) ने एक साथ मिलकर हेल्थ इंश्योरेंस के मामले पर जागरुकता बढ़ाने का फैसला किया है। लोगों को समझना जरूरी है कि हेल्थ इंश्योरेंस आजकल के बदलते समय में काफी बड़ी जरूरत बन गई है।



आजकल आने वाले विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से जागरुकता बढ़ रही है और हमें इस बात के लिए शुक्रगुजार होना चाहिए कि बीमा कंपनियों के पास बहुत से हेल्थ इंश्योरेंस के प्रोडक्ट हैं।



हालांकि इतनी सारी हेल्थ पॉलिसी के ऑफर देखकर दिमाग चकरा भी जाता है किस प्लान पर भरोस करें औक किससे बचें। लिहाजा इस लेख को पढ़ने के बाद आपको इतनी जानकारी मिलेगी जो एक अच्छा हेल्थ इंश्योरेंस प्लान चुनने में आपकी मदद कर सकती है।



1. को-पेमेंट एक जरूरी कारक हो सकता है


को पेमेंट वो विकल्प होता है जो हरेक पॉलिसी होल्डर क्लेम लेते वक्त चुकाने का वक्त करता है। हरेक इश्योरेंस कंपनी, इश्योरेंस पॉलिसी और अलग-अलग पॉलिसी के केस में ये राशि अलग अलग हो सकती है। को-पेमेंट की पूंजी कुल राशि का 0-3 फीसदी के बीच हो सकती है।



कुछ कंपनियां अपनी को-पेमेंट राशि को शून्य भी कर देती है, हालांकि इसके साथ ही वो कुछ अलग से प्रीमियम भी वसूल सकती हैं। इसलिए ग्राहकों को सलाह दी जाती है कि हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय अपने हिसाब से देखें कि वो कम प्रीमियम देकर ज्यादा को-पेमेंट भुगतान करेंगे या कुछ अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान कर को-पेमेंट के खर्च से बचना चाहते हैं।



2. हॉस्पिटलाइजेशन के पहले और बाद के खर्चों का कवर


अलग-अलग हेल्थ प्लान हॉस्पिटलाइजेशन के पहले और बाद के खर्चों को हेलेथ पॉलिसी के तहत कवर करने के लिए अलग अलग नियम अपनाती हैं।



कुछ प्लान के तहत हॉस्पिटलाइजेशन के पहले 60 दिन के खर्चों को कवर किया जाता है और कुछ प्लान में हॉस्पिटलाइजेशन के बाद के 90 दिन के खर्चों का कवर मिलता है। उदाहरण के लिए अपोलो हेल्थ म्यूनिख प्लान के तहत हॉस्पिटलाइजेशन के पहले 30 दिन का खर्चे के साथ हॉस्पिटलाइजेशन के बाद के 60-90 दिन का खर्च उठाया जाता है। वहीं कुछ हेल्थ प्लान में आपके इलाज के कुल खर्च का सिर्फ कुछ फीसदी खर्च का भार बीमा कंपनी द्वारा कव होता है।



3. डोमाइसिल ट्रीटमेंट की सुविधा तभी लें अगर आपकी आयु ज्यादा हो तो

डोमिसाइल ट्रीटमेंट की के तहत ग्राहक घर पर होने वाले इलाज की सुविधा ले सकते हैं। डोमिसाइल ट्रीटमेंट की सुविधा उन लोगों के लिए अच्छी साबित हो सकती है जो इलाज के लिए अपने घर से बाहर या अस्पताल नहीं जा सकते हैं।



हममें से ज्यादातर लोग अपने हेल्थ प्लान के साथ इस सुविधा को ले लेते हैं, भले ही हमें इसकी जरूरत हो या नहीं, इसका परिणाम ये होता है कि हमें भारी प्रीमियम देना पड़ता है। चूंकि सिर्फ पर घर इलाज कराने की जरूरत ज्यादातर गंभीर बीमारियों या वृद्धावस्था में ही होती है, इसलिए युवावस्था में डोमिसाइल ट्रीटमेंट की सुविधा लेने से बचें तो बेहतर होगा।



4. अपनी आयु और अन्य स्वास्थ्य दशाओं के आधर पर इंश्योरेंस ले तो ही बेहतर होगा

ज्यादातर हेल्थ प्लान लेते समय आपकी आयु के आधार पर प्लान दिए जाते हैं, किसी व्यक्ति को कोई हेल्थ प्लान किसी निश्चित आयु तक ही दिए जा सकते हैं। सामान्य तौर पर हेल्थ प्लान में 60 साल तक की आयु तक आप फैसला कर सकते हैं।



हर साल आयु बदलने के साथ हेल्थ इंश्योरेंस प्लान में कुछ बदलाए किए जाते हैं, ज्यादातर इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम होने की संभावना बढ़ने के साथ आपकी प्रीमियम राशि में भी बढ़ोतरी करती जाती हैं, इसलिए प्लान लेते समय रिनूवल प्रोसेस की दरें देखकर भी चुनाव करना चाहिए।



5. सब-लिमिट को देखकर चुनाव करें तो ज्यादा बेहतर है


आपके हेल्थ प्लान के साथ मेडिकल खर्चों को कवर करने के लिए से जो राशि वसूली जाती है इसे सब लिमिट कहा जा सकता है। ये मुख्य तौर पर आपके हेल्थ कवर के सम इंश्योर का कुछ फीसदी होता है। उदाहरण- डे केयर ट्रीटमेंट के तहत आपके कुल सम इश्योर का सिर्फ 20 फीसदी ही लिया जा सकता है।  साथ ही अलग-अलग ट्रीटमेंट के लिए भी कुछ अलग शर्ते हो सकती है।



इसके साथ ही आपको इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि अलग पॉलिसी की अलग सब लिमिट होती हैं जिन्हें मैनेज करना कठिन हो सकता है। इसलिए आपको सलाह दी जाती है कि आप देखकर ऐसा हेल्थ प्लान चुनें जिसमें कम से कम सब लिमिट हों और आपके लिए कम परेशानी हो।



6. इलाज के खर्चों की सीमाओं पर ध्यान रखें

हेल्थ प्लान में सम एश्योर्ड के साथ-साथ कुछ कैप भी लगाए जाते हैं जैसे कि किसी अमुक बीमारी के लिए इतना ही खर्च किया जा सकता है। इसके अलावा इसमें इलाज के दिनों का भी हिसाब रखा जा सकता है। हेल्थ प्लान में डेकेयर ट्रीटमेंट, अस्पताल में भर्ती होने वाले दिनों का हिसाब वगैरह रखा जाता है। साथ ही कुछ पॉलिसी में नॉन-एलोपैथिक, यूनानी, आयुर्वेकिक खर्चों को भी कवर नहीं किया जाता है, इस सब के बारे में पूरी जानकारी लेकर ही हेल्थ प्लान चुनना चाहिए।



आप ऐसे ही हेल्थ प्लान को चुनें जो आपकी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो सके और आपकी स्वास्थ्य के लिए जरूरी इलाज की बातों को पूरा करने में सक्षम हो



7. टैक्स बेनेफिट और लॉयल्टी बोनस

अगर ग्राहक एक ही पॉलिसी प्रदाता के साथ जुडा़ रहता है और हर साल पॉलिसी का रिनूवल कराता हो तो इसके पॉलिसीधारक को कुछ फायदे भी मिलते हैं। कुछ बीमा कंपनियां हर साल अपने ग्राहकों को बोनस देती हैं जबकि कुछ कंपनियां हर 2 साल में अपने ग्राहकों को बोनस के रूप में कुछ देती हैं। हालांकि इसके साथ आपको अपनी हेल्थ पॉलिसी से होने वाले टैक्स बेनेफिट को नहीम भूलना चाहिए। एक साल के लिए दी जाने वाली ज्यादातर हेल्थ पॉलिसी में टैक्स बेनेफ्ट मिलता है जबकि 2 साल के लिए ली जाने वाली हेल्थ पॉलिसी में सिर्फ पहले साल के लिए ही टैक्स बेनेफिट का फायदा मिल सकता है।



तो इन सब बातों का ख्याल रखने के अलावा आपको कुछ अलग से मिलने वाली सुविधाओं के बार में भी पता होना चाहिए। जैसे फ्री-हेल्थ चेकअप, शुरुआती हेल्थ चेकअप के लिए वसूली गई राशि का रिफंड, ओपीडी खर्चों के लिए अलग-अलग वेटिंग पीरियड और अन्य कुछ सुविधाएं जैसे डेली कैश बेनेफिट और दुर्घटना में होने वाली मौत के लिए बीमा की सुविधा आदि।



हेल्थ इंश्योरेंस लेना हर व्यक्ति की आधारभूत जरूरत बनता जा रहा है लेकिन हेल्थ पॉलिसी लेने से पहले ऊपर बताई गई बातों का पालन करें तो आप सबसे बेहतर हेल्थ प्लान लेने में सफल हो सकते हैं।