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अपनी पूंजी पर टैक्स की मार से कैसे बचें

प्रकाशित Tue, 30, 2011 पर 18:05  |  स्रोत : Moneycontrol.com

30 अगस्त 2011

सीएनबीसी आवाज़



ज्यादातर लोग टैक्स बचाने के लिए काफी परेशान रहते हैं। आयकर की धारा 80 सी के तहत 1 लाख रुपये तक के निवेश पर टैक्स बचाने के लिए लोग कुछ भी करते हैं। सैक्शन 80 डी के तहत सालाना 15,000 रुपये बचाने के लिए मैडिकल इंश्योरेंस कराते हैं। इतना ही नहीं वो लोग जो सबसे निचले टैक्स ब्रेकेट में आते हैा वो लोग भी इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में निवेश करना चाहते हैं, भले ही इनमें 5 साल का लॉक-इन पीरियड होता है।



जब लोग टैक्स बचाने के लिए इतना ही उत्सुक रहते हैं तो उन्हें ऐसे उपाय क्यों नहीं अपनाने चाहिए जिनसे उनकी मेहनत से कमाई गई पूंजी पर कम से कम टैक्स देनदारी बने।



आइये इसे एक उदाहरण के जरिए समझते हैं- पिछले वित्त वर्ष में राम ने 30,000 रुपये एनएससी में निवेश किए और 40,000 रुपये पीपीएफ में निवेश किए। इन दोनों निवेश साधनों से आने वाले ब्याज पर अलग-अलग दरों से टैक्स लगाया जाता है। एनएससी निवेश पर जो टैक्स लगता है वो अलग दायरे में आता है।



हालांकि पीपीएफ की पूंजी पूरी तरह से टैक्स फ्री है और हालांकि जब इसपर एकमुश्त राशि मिलती है तो भी निवेशकों को इस पर टैक्स नहीं देना पड़ता है। अब जब दोनों ही माध्यम आपको एक तरह से रिटर्न दे रहे हैं तो ऐसे में पीपीएफ और एनएससी से मिलने वाले पूंजी पर अलग-अलग से टैक्स क्यों लगाया जाता है। अगर राम ने 70,000 रुपये पीपीएफ में ही लगाए होते तो उसे निश्चित तौर पर ज्यादा पूंजी हाथ में आई होती। हालांकि इसके लिए अपने पैसे को 15 साल के लिए लॉक-इन करना होता। अब इस उदाहरण से आप स मझ सकते हैं कि एक छोटा सा फैसला आपके आर्थिक हालात को किस तरह प्रभावित कर सकता है।



अब सामान्य निवेश विकल्पों पर नजर डालें और देखें कि इनमें निवेश पर आपको क्या फायदा मिल सकता है। कई लोग एफडी में निवेश करते हैं और कई लोगों की ये पहली पसंद होती है क्योंकि इनमें जोखिम कम होता है। हालांकि पीपीएफ के अलावा आप अगर देखें तो आपके पास ऐसा कौनसा विकल्प है जिसमें बेहतर रिटर्न मिल सकते हैं और पैसा भी कम समय के लिए लॉक-इन में रखना पड़ता है। इसका जबाव शायद आप लोग जानते हैं- फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (एफएमपी), ये एणएफ इंडस्ट्री का एक नया विकल्प है।



एफएमपी मुख्य तौर पर कुछ सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं- जैसे बैंक सीडी, कंपनी के कमर्शियल पेपर, बॉन्ड वगैरह में। ये सभी डेट साधन हैं और इससे जाहिर होता है और एफएमपी पूरी तरह से एक डेट प्रोडक्ट है। तो फिर आपको एफएमपी के जरिए बेहतर बॉन्ड यील्ड कैसे मिल सकती है। क्या इनका कंपोनेंट बैंक एफडी से ज्यादा जोखिम भरा होता है। अगर बैंक आपको कमर्शियल डिबेंचर के जरिए ज्योदा जोखिम के साथ रिटर्न देते हैं, तो क्या हम इस तरह के बेहतर रिटर्न की बात कर रहे हैं जिसमें उच्च जोखिम मिला हुआ है।



कुछ मामलों में ज्यादा जोखिम उठाने के ऊपर ज्यादा रिटर्न कमाने की संभावना शामिल हो सकती है लेकिन एफएमपी के बारे में एक अलग पहलू भी है और वो इसकी टैक्स प्रक्रिया। अगर एफएमपी में आप डिविडेंड ऑप्श्न लेते हैं तो जाहिर तौर पर आपको टैक्स फ्री इंकम मिल सकती है। डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन में 13.52 फीसदी के आसपास टैक्स लग सकता है, जो वैसे तो कंपनी के द्वारा दिया जाता है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ये पैसा निवेशक की जेब से ही जाता है।



वहीं एफएमपी में ग्रोथ ऑप्शन में इनडेक्सेशन के साथ 20 फीसदी और इनडेक्सेशन के बगैर 10 फीसदी की दर से टैक्स लग सकता है। अब अगर 20 फीसदी इनडेक्सेशन के ऑपअशन के आधार पर देखें तो टैक्स लगने की प्रक्रिया भी अलग अलग हो सकती है। इस बदलाव को डीटीसी कहा जाता है। डीटीसी के तहत प्रावधान हैं कि इनडेक्सेशन के बाद होने वाले कैपिटल गेन्स को आयकर की मौजूदा धाराओं के आधार पर टैक्स देनदारी बनेगी। वहीं इसमें डिविडेंड की आय को इंकम के साथ जोड़े जाने का भी प्रावधान है।



ग्रोथ ऑप्शन में इंडेक्सेशन विकल्प लेना हमेशा बेहतर रहता है बजाए आप कमाए गए ब्याज के ऊपर टैक्स चुकाएं।



इक्विटी एमएफ और इक्विटी में निवेश का विकल्प क्यों नहीं अपनाया जा सकता है। इनमें भी लंबे समय तक पैसे लगाने के बाद कैपिटल गेन का फायदा मिलता है और इससे ये काफी आकर्षक लगते हैं। लेकिन ये एक अलग ऐसेट क्लास है और आपको इसके साथ ऊंचे रिटर्न के साथ ऊंचे जोखिम भी उठाने पड़ सकते हैं।



इसलिए एफएमपी सिर्फ टैक्स बचाने के लिहाज से ही नहीं बल्कि निवेश लिकल्पर के रूप में भी बढ़िया साधन हैं। इसके जरिए ना आप अपना निवेश लक्ष्य हासिल कर सकते हैं बल्कि समझौता करने से भी बच सकते हैं। आपको सलाह दी जाती है कि इस निवेश विकल्प के बारे में एक बार जरूर सोचें।



ये लेख लैडर7 फाइनेंशियल एडवाइजर्स के सुरेश सदागोपन द्वारा लिखा गया है।