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क्या लगातार मुनाफावसूली करना सही रणनीति है?

प्रकाशित Mon, 12, 2011 पर 14:28  |  स्रोत : Moneycontrol.com

12 सितंबर 2011

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राममोहन को निवेश करते समय एक सवाल हमेशा परेशान करता था, वो बाजार ऊपर जाने के समय मुनाफावसूली करना चाहते थे और जब बाजार नीचे जाए तो बाजार में दोबारा निवेश करना चाहते थे लेकिन कैसे और कब। हांलांकि इस मामले में उनके दोस्त आदित्य का कहना था कि हर उछाल पर मुनाफावसूली करके पैसा बाहर निकालने से बेहतर है कि लंबे समय के लिए निवेश बनाए रखा जाए जो वैल्थ क्रिएशन करने में काम आए।



आदित्य ने अपनी बात साबित करने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए-



1. निवेश हमेशा किसी लक्ष्य के साथ होना चाहिए। जब आपने किसी बड़ी योजना के लिए निवेश किया है तो आप बीच बीच में मुनाफावसूली करके निवेश को बिगाड़ना क्यों चाहते हैं। उतार-चढ़ाव के समय नफा-नुकसान कमाने की बात कहना आसान है, करना कठिन। 2007 का ही उदाहरण ले लें। उस समय कई बाजार पंडितो ने कहा कि बाजार जोरदार उछाल दिखाएंगे और कई लोगों ने चढ़ते बाजार में पैसा लगाना शुरू कर दिया। उनका सोचना था कि चढ़ते बाजार में जल्दी ही मुनाफावसूली करके शानदार रिटर्न कमा लेंगे लेकिन जब बाजारों में जल्दी ही जोरदार गिरावट आ तो कईयो को भारी घाटा उठाना पड़ा और उनकी पूंजी डूब गई। बाजार में सही समय का अंदाजा लगाना सबसे मुश्किल काम है। आपके पास हमेशा सही मौके नहीं आते इसलिए बेहतर है कि निवेश धीरे-धीरे करें, लंबे समय के लिए करें और अच्छे रिटर्न कमाएं।



2. अगर आप बार-बार पैसा निकालते-निवेश करते हैं तो इसके साथ और खर्चे भी होते हैं, आपको इनका भी ख्याल रखना चाहिए। कई लोग लोन की सस्ती ब्याज दर के लिए एजेंसी बदलते रहते हैं, लेकिन इसके साथ कई तह की फीस और पेपरवर्क भी जुड़ा होता है। इसी तरह बार-बार इक्विटी खरीदने-बेचने के लिए आपको ब्रोकरेज फीस भी चुकानी पड़ती है। तो इस तरह के जल्दी-जल्दी ट्रांजैक्शन से आखिर में आपके पास ज्यादा बचत नहीं होती है। निवेशकों को मौकापरस्त होना चाहिए ये कहना सबसे आसान है लेकिन इसे उतना आसान नहीं जितना लगता है। तो आपको देखना चाहिए कि हमेशा मुनाफावसूली की फिराक में रहना आपकी जेब के लिए भार बढ़ा तो नहीं रहा है।



3.
अगर आपने शेयरों-इक्विटी में निवेश लंबे समय के लक्ष्यों जैसे रिटायरमेंट, बच्चों की शिक्षा, शादी वगैरह के लिए किया है तो छोटी अवधि के फैसलों से इसे बिगाड़ क्यों रहे हैं लोग अपनी जुआ खेलने या दांव लगाने की आदत को शेयर या म्यूचुअल फंड निवेश के साथ आजमाते हैं, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। और जब इस आदत के चलते शेयर बाजार में घाटा होता है तो किस्मत को दोष देते हैं। पिछले 30 सालों का औसत हिसाब लगाएं तो शेयर बाजार ने सालाना करीब 30 फीसदी का रिटर्न दिया है। किसी भी अन्य ऐसेट क्लास में इतने बेहतर रिटर्न नहीं मिलते हैं। सोने और प्रॉपर्टी ने भी नहीं।



4. जब आप प्रॉपर्टी या सोने में निवेश करते हैं तब आप दांव लगाने की आदत नहीं अपनाते, आप सालों नहीं बल्कि दशकों तक निवेश करने की सोच रखते हैं। आपको भरोसा होता है कि लंबे समय में ये ऐसेट आपको शानदार रिटर्न दे सकते हैं। वहीं स्टॉक, शेयर इक्विटी एमएफ में आप नुकसान इसलिए उठाते हैं क्योंकि इनमें निवेश के लिए कुछ दिनों से लेकर कुछ महीनों का ही इंतजार करने को तैयार होते हैं। देखिए, लंबे समय के लिए निवेश करें और आपको शानदार रिटर्न जरूर मिलेंगे, भरोसा रखें।



5. शेयर और म्यूचुअल फंडों की एनएवी (नेट ऐसेट वैल्यू) रोजाना देखी जा सकती है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि आप उतार-चढ़ाव और तेजी-मंदी से प्रभावित होकर रोज ही बेचने या खरीदने का फैसला बदलें। जब आपने लंबी अवधि के लिए निवेश किया है तो आपको अपने फैसले पर भरोसा होना चाहिए। अपने पोर्टफोलियो को तिमाही आधार पर देखें या फिर 6-6 महीने के अंतराल से देखना ठीक रहेगा। अगर निवेश रणनीति सही साबित हो रही है तो आपको इससे छेड़छाड़ करने की जरूरत नहीं है।



6. डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो बनाना बेहतर है- कहा जाता है कि सफर के दौरान सारे पैसे को एक ही जेब में नहीं रखना चाहिए। इसी तरह निवेश करते समय सारी पूंजी एक ही ऐसेट क्लास में ना लगाएं।



एक डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो ही लंबी अवधि में अच्छा प्रदर्शन करता है। इतना ही नहीं एक ऐसेट क्लास में भी कभी कभी डाइवर्सिफिकेशन करना जरूरी होता है। ठीक उसी तरह जैसे आजकर लोग सोने में निवेश बढ़ाते जा रहे हैं लेकिन इसमें भी अलग तरीकों से निवेश करें जैसे गोल्ड ईटीएफ, रॉ गोल्ड, गोल्ड फंड आदि। 



लोग हमेशा यही सोचकर निवेश करते हैं कि मौजूदा समय में कैसा रिटर्न मिल रहा है, वो ये नहीं सोचते कि लंबी अवधि में इससे कितना रिटर्न मिलेगा।



7. अगर लंबी अवधि के लिए निवेश करना है तो संचयी या ग्रोथ ऑप्शन के जरिए निवेश करें। छोटे-छोटी डिविडेंड की रकम हासिल करते रहना और उसका रिकॉर्ड रखने में लगे रहना कोई समझदारी की बात नहीं है। डिविडेंड सीधा आपके बैंक खाते में आता है और आपको पता लगे बिना अन्य रकम के साथ खर्च भी हो जाता है। तो इस तरह आपको कंपाउंडिंग का फायदा नहीं मिलता और आपके पास ज्यादा पूंजी नहीं आती है।