प्रीमियम वक्त पर भरें, पॉलिसी का फायदा लें -
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प्रीमियम वक्त पर भरें, पॉलिसी का फायदा लें

प्रकाशित Tue, 20, 2011 पर 13:17  |  स्रोत : Moneycontrol.com

20 सितम्बर 2011

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बीमा खरीदने के बाद पॉलिसीधारक को इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए कि उसे सभी प्रीमियम समय पर भरने हैं वर्ना बीमा खरीदने का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा और ये एक सुविधा की बजाए मुसीबत बन जाएगी।



संजीव पटेल जो एक सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल हैं और अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य हैं, उन्होंने अपने परिवार के लिए एक परंपरागत बीमा पॉलिसी खरीदी और इसके सभी प्रीमियम समय पर चुकाए। अपने दफ्तर से लौटते समय एक दुर्भाग्यपूर्ण सड़क हादसे में उन्होंने अपनी जान गंवा दी। लेकिन ऐसे मुश्किल समय में उनके जाने के बाद बीमा कंपनी से मिली क्लेम की राशि उनके परिवार के लिए बहुत बड़ा सहारा बनकर आई और उनका जीवन मुश्किलों में फंसने से बच पाया।



इस से साफ है कि अगर संजीव पटेल ने समय से इंश्योरेंस प्रीमियम नहीं चुकाए होते तो उनकी पॉलिसी लैप्स्ड हो सकती थी। इससे उनके परिवार का सुरक्षा कवच खत्म हो सकता था क्योंकि किसी भी सूरत में बीमा कंपनियां उन पॉलिसी को क्लेम नहीं करती जिनके प्रीमियम अधूरे हों या समय से और पूरे ना भरे गए हो।



बीमा कंपनियां सिर्फ उन्हीं पॉलिसी के लिए क्लेम पर विचार करती हैं अगर सभी प्रीमियम समय पर भरे गए हों और पॉलिसी सक्रिय हो। मान लीजिए कि किसी परंपरागत बीमा पॉलिसी के 3 साल तक प्रीमियम समय पर भरे गए हों और चौथे साल में आकर प्रीमियम ना चुकाए जाएं तो पॉलिसी निष्क्रिय हो जाती है।

आपकी जरा सी लापरवाही या भूल चुक की वजह से पॉलिसी लैप्स हो जाती हैं और परिवार का वित्तीय सुरक्षा कवच खत्म हो जाता है।



वैसे पॉलिसीधारक समय से प्रीमियम भरना ना भूलें इसके लिए बीमा कंपनियां समय समय पर रिमाइंडर भेजती रहती हैं। इस रिमाइंडर में ग्रेस पीरियड का भी उल्लेख रहता है।



मासिक प्रीमियम पेमेंट के लिए ग्रेस पीरियड 15 दिन का होता है और तिमाही और सालाना प्रीमियम के लिए ग्रेस पीरियड 30 दिन का हो सकता है। अगर ग्राहक ग्रेस पीरियड के दौरान भी प्रीमियम चुकाने में असफल रहता है तो बीमा कंपनियां इस बात की भी सूचना भेजती हैं।



अगर आपकी पुरानी पॉलिसी लैप्सड हो जाए तो क्या आपको नई पॉलिसी खरीदने की जरूरत होगी ?



जी नही, क्योंकि आप पुरानी पॉलिसी को रिन्यू करा सकते हैं। हालांकि बीमा कंपनियों ने इसके लिए कुछ नियम और शर्ते बना रखे हैं जिनका आपको पालन करना होगा। बीमा नियामक इरडा के मुताबिक अगर बीमाधारक की पॉलिसी को 3 साल हो चुके हैं तो उसके पास पॉलिसी को फिर से देखने और कुछ बदलाव करने की इजाजत मिलती है।



पॉलिसी लैप्स होने के 6 महीने के भीतर- अगर बीमा पॉलिसी को लैप्स हुए सिर्फ 6 महीने हुए हों तो पॉलिसी का जो प्रीमियम बाकी है उसका भुगतान करें, उसके साथ ब्याज का भुगतान करें और आप अपनी पॉलिसी को जीवित करा सकते हैं।



अगर ग्राहक की पॉलिसी 3 साल से ज्यादा समय के लिए निश्क्रिय हालत में बनी रहे तो सरेंडर चार्ज 100 फीसदी तक पहुंच सकते है, ऐसी हालत में सभी शुल्क चुकाने के बाद परिवार के पास ज्यादा कुछ नहीं बचता है। हालांकि अब इस स्थिति में बदलाव के लिए इरडा ने निर्देश दिए हैं कि अगर पॉलिसीधारक की पॉलिसी 3 साल से ज्यादा समय के लिए चलाई गई है और सभी प्रीमियम समय से भरे गए हैं, इस सूरत में पॉलिसी लैप्स होने के 2 साल के भीतर दोबारा रिन्यू कराई जा सकती है। 



हालांकि इतना लंबा गैप होने के बाद बीमाकर्ता कंपनी ग्राहक से दोबारा सारे मैडिकल टैस्ट कराने के लिए कह सकती है। जाहिर है बीमा कंपनी इस बात की जांच करना चाहती है कि जिस दौरान आपने पॉलिसी प्रीमियम नहीं भरे हैं, उस दौरान किसी बीमारी ने तो ग्राहक को नहीं घेरा है। 



वहीं इस तरह के मामलों में कुछ और शर्ते भी लगाई जाती हैं। अगर पॉलिसी रिवाइव होने के 1 साल के भीतर पॉलिसीधारक आत्महत्या कर लेता है तो भी बीमा कंपनी क्लेम देने से इंकार कर सकती है। वहीं अगर पॉलिसी रिन्यू होने के 2 साल के अंदर पॉलिसीधारक की मौत हो जाती है तो भी बीमा कंपनी के पास पूरे अधिकार हैं कि वो सारी जांच और पड़ताल कर सके कि मौत किस वजह से हुई थी।



अगर पॉलिसी लैप्स हो जाए तो क्या बेनेफिशरी क्लेम के लिए आवेदन कर सकता है ?



ये पूरी तरह इस बात पर निर्भरता करता है कि पॉलिसी को रिवाइव कराने में कितना समय लगाया गया है।



अगर पॉलिसी 3 साल से कम समय के लिए सक्रिय रही हो और बेनेफिशरी क्लेम के लिए आवेदन करता है तो बीमा कंपनी क्लेम को खारिज कर सकती है। हांलाकि ऐसा सूरत में बीमाकर्ता कंपनी को वो सभी प्रीमियम और ब्याज की राशि बेनेफेशरी को चुकानी पड़ सकती है।



इरडा के निर्देशों के मुताबिक, अगर पॉलिसी 3 साल से ज्यादा समय के लिए सक्रिय रही हो तो डिपेंडेट को इसका कुछ लाभ मिल सकता है लेकिन बेनेफिशरी को पूरा सम एश्योर्ड नहीं मिल सकता है। ग्राहक ने जितना पैसा प्रीमियम और अन्य खर्चों के रूप में चुकाया है, बीमा कंपनी इस राशि को जोड़कर बेनेफिशरी को सम एश्योर्ड का कुछ फीसदी हिस्सा चुका सकती है।



अगर आप प्रीमियम अफोर्ड ही ना कर पाएं तो क्या हो सकता है ?


बीमा कंपनियां, पॉलिसीधआरक को कुछ सुविधाएं भी मुहैया कराती हैं, जैसे- सम एश्योर्ड के हिसाब से ग्राहक को कम प्रीमियम देना पड़ सकता है, जिससे उनका कवर खत्म ना हो लेकिन उनके प्रीमियम का बोझ कुछ कम हो सके। वहीं ग्राहक को उसके प्रीमियम के भुगतान के तरीके में भी बदलाव के विकल्प दिया जा सकता है, जैसे मासिक, तिमाही और सालाना प्रीमियम चुकाने की सुविधा।



यूनिट लिंक्ड इंश्योरेसं पॉलिसी (यूलिप)

अगर आपने यूलिप पॉलिसी ली है जो एक बीमा और निवेश का मिला-जुला रूप है तो आपको इस पर अलग तरह के शुलके चुकाने पड़ सकते हैं। पिछले साल इरडा ने यूलिप के लिए नई गाइडलाइंस का एलान किया जो सितबंर 2010 से लागू हो चुकी हैं। इनके मुताबिक यूलिप पॉलिसी लैप्स होने की सूरत में पॉलिसीधारक या तो पॉलिसी को रिन्यू करा सकता है या फिर इस पॉलिसी से पूरी तरह बाहर हो सकता है।



वहीं परंपरागत बीमा प्लान में अगर बीमाकर्ता प्रीमियम चुकाने की स्थिति में नहीं है तो ग्रेस पीरियड के दौरान प्रीमियम चुका सकता है। अगर ग्रेस पीरियड के दौरान प्रीमियम नहीं दिए जाएं तो फिर पॉलिसी डिस्कंटीन्यू ( लैप्स पॉलिसी के लिए नई टर्म) हो सकती है। अगर आपकी पॉलिसी डिस्कंटीन्यू हो जाती है तो भी आपके पास 2 विकल्प हैं, पॉलिसी को दोबारा जीवित कराएं या फर सरेंडर कर दें।



पॉलिसी डिस्कंटीन्यू होने के 15 दिन के अंदर बीमा कंपनी पॉलिसीधारक को नोटिस भेजती है और इस नोटिस के 30 दिन के अंदर आपकी पॉलिसी रिवाइव हो जानी चाहिए। ग्राहक बचे हुए प्रीमियम को चुका कर पॉलिसी रिवाइव करा सकता है। अगर ऐसा नहीं करना चाहता तो बीमा कंपनी पॉलिसी डिस्कंटीन्यू चार्ज (6000 रुपये से ज्यादा नहीं) काटकर बाकी बची फंड वैल्यू ग्राहक को लौटा सकता है।



पॉलिसी सरेंडर करने की सूरत में- अगर पॉलिसीधारक 5 साल के लॉक-इन समय से पहले ही पॉलिसी को सरेंडर कर देता है तो फंड की न्यूनतम रिटर्न का हिसाब लगाकर ग्राहक को पैसा वापस कर दिया जाता है। शुरुआती समय में फंड को कम से कम 3.5 फीसदी का गारंटीड रिटर्न देना ही होता है।



हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी

पहले हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लैप्स होने की सूरत में ग्रेस पीरियड नहीं मिलता था। इसका अर्थ ये है कि अगर प्रीमियम भुगतान में देरी हो जाए या छूट जाए तो प़ॉलिसी खत्म और इसके कोई भी फायदे पॉलिसीधारक को नहीं मिलते थे। इसके बाद मार्च 2009 में इरडा ने नियमों में बदलाव किया। इसके तहत हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों को निर्देश मिले कि उन्हें पॉलिसी लैप्स होने की सूरत में रिन्यू कराने की सुविधा देनी होगी, साथ ही भविष्य में आने वाले प्रीमियम के बारे में भी बताना होगा। प्रीमियम ना चुकाने की सूरत में ग्राहक को 15 दिन का ग्रेस पीरियड भी देना होगा जिससे पॉलिसी रिन्यू हो सके।



हेल्थ इंश्योरेंस में प्री एक्जिजटिंग डिजीज उसी सूरत में कवर होती हैं अगर आपने समय समय पर पॉलिसी का रिन्यूअएल और प्रीमियम चुकाए हों।



जितनी जल्दी आप जीवन बीमा खरीदेंगे उतना ही बेहतर आपके लिए होगा क्योंकि आप कम उम्र की वजह से कम प्रीमियम का फायदा उठा पाएंगे। लेकिन सिर्फ जल्दी पॉलिसी खरीदकर ही खुश ना हों, बल्कि समय पर प्रीमियम देना भी याद रखें।



ये लेख निर्मल बंग से साभार लिया गया है।