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कमज़ोर बाज़ारों के लिये विजयी कार्यनीति

प्रकाशित Tue, 22, 2010 पर 13:02  |  स्रोत : Hindi.in.com

22 जून, 2010


moneycontrol.com


 


ये लेख इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कब पढ़ रहे हैं। इस वर्ष अगर आपने म्यूचुअल फंड में निवेश किया है, पोर्टफोलियो मैनेजमैंट सर्विस के द्वारा केवल दीर्घ अवधि निवेश किया है या फिर खुद शेयरों की खरीद फ़रोख्त की है तो काफ़ी संभावना है कि आपने अभी तक अधिक पैसा नहीं कमाया है। जिस तरह से 2010 में बाज़ार नीचे गिरा है, उसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि आपके पोर्टफोलियो मैनेजर ने आपके पोर्टफोलियो के लिये अधिक कुछ नहीं किया होगा। बेहतर मैनेजरों की संख्या का प्रतिशत कुछ कम ही है, और कुछ ने तो स्थिति काफ़ी खराब कर दी है। तो क्या इसका मतलब ये है कि भारत में प्रतिभाशाली फंड मैनेजर नहीं बचे हैं। नहीं, इसका अर्थ ये है कि हमें पारंपरिक तरीकों से स्टॉक्स की खरीद-फरोख्त के तरीकों को बदलने की ज़रूरत है।


 


इसका सबसे बङ़ा कारण ये है कि जब बाज़ार में 49/50 बङ़े शेयर गिरावट पर हों तो कोई भी फंड मैनेजर किसी भी प्रकार का निवेश ना करके रिटर्न्स के रूप में शून्य ही दे सकता है।


 


दीर्घ अवधि का निवेश केवल लगातार बढ़त के बाज़ार में ही अच्छे रिटर्न दे सकता है। जैसा 2004 और 2006 के बीच में हुआ था, जब भारत की विकास रफ्तार चरम पर थी। हालांकि हर साल सन 2009 के जैसा नहीं हो सकता। हमें ये बात समझनी होगी कि बाज़ार में अस्थिरता आती है और बाज़ार या तो नीचे गिरते हैं या सीमा के भीतर ही कारोबार करते हैं। निवेशकों को पैसा बनाने के रास्ते खोजने होंगे। इसके लिये फिक्सड डिपॉजिट में पैसा डाल कर छोङ देना कोई जवाब नहीं है। ये महंगाई को नहीं रोक सकता। विभिन्न तरीके, विभिन्न साधन, तरह तरह की निवेश कार्यनीति और लंबी व छोटी अवधि के निवेश संयोजन (लॉन्ग-शॉर्ट निवेश) के द्वारा आप एक शुरुआत कर सकते हैं।




यहां लॉन्ग-शॉर्ट निवेश से अर्थ है कि आप उन स्टॉक्स में लंबा निवेश करें जिनके लिये आपको विश्वास है कि ये उछाल पर जायेंगे, और जिन स्टॉक्स के अधिक ऊपर जाने की आशा नहीं है, उन स्टॉक्स में छोटी अवधि का निवेश करें। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है - आपके पास 10 पसंदीदा स्टॉक्स हैं, उनमें से आपके पांच पसंदीदा स्टॉक्स में आप फ्यूचर्स के लिये लॉंन्ग कर सकते हैं, और पांच कम पसंद के स्टॉक्स को श़ॉर्ट करें। लॉन्ग-शॉर्ट निवेश में आपने लगभग बराबर बराबर पैसा लगाया है, इसका अर्थ है कि बाज़ार में आपका कुल एक्सपोज़र शून्य है।


 


सामान्य रूप से आपका पोर्टफोलियो बाज़ार के उतार चढ़ावों से अप्रभावित रहता है लेकिन विभिन्न शेयरों के प्रदर्शन का लाभ उठा सकता है। इस हिसाब से लॉन्ग-शॉर्ट निवेश किसी मैनेजर की काबिलियत का सच्चा इम्तिहान होता है। आपको कैसे रिटर्न मिलेंगे, ये बाज़ार के प्रदर्शन पर नहीं बल्कि मैनेजर के सही स्टॉक्स चुनने की प्रतिभा पर निर्भर करता हैं। क्या आपने जीतने वाले स्टॉक्स में लंबा निवेश किया और हारने वाले स्टॉक्स में छोटा निवेश किया, इसमें कोई बहाना नहीं चल सकता।


 


भारत में लॉन्ग-शॉर्ट निवेश काफ़ी साधारण तरीके से किया जाता है - यहां पेअर ट्रेड करने का चलन है, जैसे एक स्टॉक में लंबा निवेश करें और अन्य स्टॉक्स में छोटी अवधि का निवेश करें। हालांकि ये एक जोखिम वाला कारोबार हो सकता है क्योंकि आप केवल दो स्टॉक्स को रख रहे हैं। रिलायंस और आरएनआरएल के बीच पेअर ट्रेड करने के खतरे का आप अंदाज़ा लगाइये।


 


वास्तविक लॉन्ग-शॉर्ट निवेश जो वैश्विक स्तर पर होता है, उसका अर्थ है कि आप अपने पोर्टफोलियो में काफ़ी विविधतापूर्ण स्टॉक्स को रखें। उदाहरण के लिये पोर्टफोलियो में 20 से अधिक लॉन्ग स्टॉक्स और 20 से अधिक - शॉर्ट स्टॉक्स रखें। विभिन्नता रखने से जोखिम की संभावनायें कम होती हैं, आम धारणा है कि फ्यूचर्स और ऑप्शन में निवेश करना हमेशा ही जोखिम भरा होता है, इसके विपरीत जिस पोर्टफोलियो में लॉन्ग-शॉर्ट निवेश का सही संतुलन होता है वो केवल लॉन्ग पोर्टफोलियो से कम जोखिम वाला होता है।


 


भारत में लोग वास्तविक लॉन्ग-शॉर्ट निवेश के प्रस्तावों पर नज़र क्यों नहीं डालते। इसका कारण है कि भारत में लंबे समय के उछाल वाले बाज़ार के बाद हम ये मानने लगे हैं कि जो भी स्टॉक्स रखता है वो पैसा बना सकता है। इसका एक कारण ये भी है कि विनियम लॉन्ग-शॉर्ट निवेश के पक्ष में नहीं हैं (पारंपरिक म्यूचुअल फंड ये नहीं देते हैं)। साथ ही पारंपरिक स्टॉक्स का चुनाव लॉन्ग-शॉर्ट के संसार में काम नहीं आता है।


 


कुछ मैनेजरों ने शॉर्ट निवेश के लिये सही कौशल दिखाया है, उन्होंने छोटी सीमा के लिये खराब स्टॉक्स को पहचाना है। लेकिन लॉन्ग-शॉर्ट निवेश के लिये काफ़ी सावधान रहकर गणितीय विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है, जैसे डॉलर के एक्सपोज़र, जोखिम की पहचान करना आदि। अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है कि फ्यूचर्स में कारोबार करने के लिये स्टॉक्स पर नज़र रखना आवश्यक है। उनसे सही समय पर लाभ उठाना आना चाहिये और उनका बचाव करना भी आना चाहिये। जाहिर है ये सब पोर्टफोलियो प्रबंधन के साथ धीरे-  धीरे आता है। यह एक शैली है जो तभी मिल सकती है अगर आप सावधानी से पोर्टफोलियो का प्रबंध करेंगे वर्ना काफ़ी गङबङ़ हो सकती हैं।
उम्मीद करते हैं कि 2008 की यादें और 2010 की चंद उत्साहवर्धक यादें हम निवेशकों और निवेश प्रबंधकों के लिये एक नयी मिसाल बन पायेंगी।



राधिका गुप्ता



लेखिका फोरफ्रंट कैपिटल की डायरेक्टर और सह संस्थापक हैं। ये निवेश प्रबंधक और आर्थिक सलाहकार हैं, आप उनसे radhika.gupta@forefrontcap.com पर संपर्क कर सकते हैं।