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यूलिप से टैक्स बचाएं

प्रकाशित Sat, 21, 2012 पर 13:35  |  स्रोत : Moneycontrol.com

आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत जीवन बीमा के यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) में निवेश पर आय में एक लाख रुपए की छूट प्राप्त की जा सकती है। आयकर अधिनियम के प्रावधान के अनुसार यूलिप में निवेश न्यूनतम पांच वर्षों के लिए किया जाना आवश्यक होता है।


बीमा बाजार में यूलिप काफी लोकप्रिय उत्पाद रहे हैं। इन प्लान की लोकप्रियता का कारण लुभावने विज्ञापन एवं एजेंटों को मिलने वाला तगड़ा कमीशन रहा है, न कि निवेशकों का हित। सामान्यतः यह देखा गया है कि अधिकांश लोग यूलिप प्लान को बिना अधिक अध्ययन किए ही एजेंटों पर विश्वास करके ले लेते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि कुछ अवधि बाद जब प्लान में अच्छे रिटर्न नहीं मिलते हैं तो उसे बंद कर दिया जाता है, जिससे भारी नुकसान उठाना पड़ता है। अतः इन प्लान को लेने के पूर्व सही रूप से समझना आवश्यक है।


कैसे काम करते हैं यूलिप प्लान : यूलिप प्लान में निवेश के साथ इंश्योरेंस कवर का लाभ भी मिलता है। इन प्लान में पांच वर्षों का लॉक-इन होता है। सामान्यतः इंश्योरेंस कवर वार्षिक प्रीमियम का पांच गुना मिलता है। यूलिप प्लान में दी गई प्रीमियम में से प्रीमियम एलोकेशन चार्ज कटने के बाद बचा हुआ पैसा फंड में निवेश किया जाता है। फंड में विभिन्न विकल्प होते हैं, जिनमें डेप्ट एवं इक्विटी में विभिन्ना अनुपात में निवेश किया जा सकता है एवं पॉलिसीधारक अपनी जोखिम-क्षमता के आधार पर फंड का चुनाव कर सकते हैं। साथ ही समय-समय पर विभिन्न फंड विकल्पों में स्वीचिंग भी कर सकते हैं। इन पॉलिसियों का रिटर्न पूरी तरह फंड के प्रदर्शन पर निर्भर करता है एवं बीमा कंपनियाँ इन प्लान में कोई ग्यारंटी नहीं देती है।


यूलिप प्लान में प्रत्येक माह पॉलिसी एडमिनिस्ट्रेशन चार्जेस, मोर्टलिटी चार्जेस, फंड मैनेजमेंट चार्जेस, स्वीचिंग चार्जेस आदि फंड यूनिट को कैंसल करके चार्ज किया जाता है।


किनके लिए बेहतर हो सकते हैं यूलिप प्लान :


आप 10 वर्षों से अधिक की निवेश योजना बना रहे हैं।


आपके पास पूर्व से ही लंबी अवधि के लिए पर्याप्त इंश्योरेंस कवर है एवं आप केवल मध्यम अवधि के लक्ष्यों के लिए कवर बढ़ाना चाहते हैं।


आप बीमा एवं निवेश को पृथक रूप से करने में सक्षम नहीं हैं।


आप विभिन्न निवेश साधनों की समझ नहीं रखते हैं।


आप बाजार के उतार-चढ़ाव में जोखिम कम करने के लिए डेप्ट से इक्विटी या विभिन्न फंड विकल्पों में बिना टैक्स भार के स्वीचिंग करना चाहते हैं।


प्रस्तावित डाइरेक्ट टैक्स कोड : डाइरेक्ट टैक्स कोड 1 अप्रैल 2012 से लागू होना प्रस्तावित है। इसके तहत आय से 1.50 लाख रुपए तक की छूट प्राप्त की जा सकेगी। इसकी निम्न 2 सब लिमिट निर्धारित की गई है।


सब लिमिट-1. एक लाख रुपए तक छूट, स्वीकृत फंड्स (न्यू पेंशन स्कीम, प्रॉविडेंड फंड, सुपर एन्यूटेशन ग्रेच्युटी आदि) में निवेश पर प्राप्त की जा सकेगी।


सब लिमिट-2. शेष 50 हजार रुपए तक की छूट, लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम (प्रीमियम राशि, बीमा राशि के पांच फीसदी से अधिक न होने पर), हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम और बच्चों की ट्यूशन फीस पर प्राप्त की जा सकेगी। अतः यदि डाइरेक्ट टैक्स कोड इसी प्रकार लागू कर दिया जाता है तो इंश्योरेंस प्रीमियम पर छूट सब-लिमिट-2 के आधार पर ही मिल पाएगी।


आपके लिए बेहतर यही होगा कि आप यूलिप प्लान से बचें एवं जीवन बीमा के लिए टर्म प्लान लें और निवेश को पृथक रूप से अपनी जोखिम क्षमता अनुसार अलग-अलग निवेश साधनों में करें, जिससे कम खर्च में आप अधिक बीमा कवर प्राप्त कर सकेंगे। साथ ही निवेश को लंबी अवधि तक करने की बाध्यता से छुटकारा, निवेश पर अधिक रिटर्न एवं जरूरत पड़ने पर निवेश को भुना भी सकेंगे। कई बार हमने देखा है कि लंबी बाध्यता के कारण एक तरफ तो व्यक्ति ऊंची ब्याज दर पर लोन लेता है एवं दूसरी तरफ उसे मजबूरीवश इस तरह के कम रिटर्न वाले साधनों में निवेश जारी रखना पड़ता है, जिससे जरूरत पड़ने पर अपना पैसा ही अपने काम नहीं आ पाता है। कई बार ऐसे में व्यक्ति प्लान बंद करने तक की योजना बना लेता है, जिससे जीवन में जिस समय सबसे अधिक इंश्योरेंस की आवश्यकता होती है, उस समय व्यक्ति के पास इंश्योरेंस ही नहीं रह जाता है।


यूलिप से आपको इसलिए भी बचना चाहिए कि यदि आपके द्वारा चुने गए यूलिप के फंड्स का प्रदर्शन अच्छा नहीं है तो चाहकर भी आप इसे बदल नहीं सकेंगे।


अतः यदि आप टैक्स बचत के लिए यूलिप प्लान लेने की योजना बना रहे हैं तो सोच-समझकर ही निर्णय लें। कहीं ऐसा न हो कि बाद में आपको पछताना पड़े?
कैसे चुनें उपयुक्त यूलिप प्लान


अपने लिए उपयुक्त यूलिप प्लान का चयन करने के पहले विभिन्न बीमा कंपनियों की अलग-अलग योजनाओं के खर्चे जैसे प्रीमियम एलोकेशन चार्जेस, मोर्टलिटी चार्जेस, पॉलिसी एडमिनिस्ट्रेशन चार्जेस, फंड मैनेजमेंट चार्जेस, स्वीचिंग चार्जेस, सरेंडर चार्जेस आदि की तुलना कर लेना चाहिए। साथ ही, विभिन्ना कंपनियों के फंड का प्रदर्शन अर्थात फंड में रिस्क एवं रिटर्न की भी तुलना करके उपयुक्त यूलिप का चयन करना चाहिए।


यह लेख अरिहंत कैपिटल मार्केट के चीफ फाइनेंशियल प्लानर उमेश राठी ने लिखा है। umesh.rathi@arihantcapital.com पर उमेश राठी से संपर्क किया जा सकता है।