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लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी से कैसे बचाएं टैक्स

प्रकाशित Fri, 27, 2012 पर 12:21  |  स्रोत : Moneycontrol.com

निवेश से टैक्स बचत की प्रक्रिया होती तो सरल है किंतु जानकारी के अभाव में लोग इसे बेहद कठिन बना लेते हैं, करदाता को अपने निवेश के आधार पर कर बचाने के लिए बड़ी जदोजहद करनी पड़ती हैं। वहीं निवेश में थोड़ी भी चूक या फिर टैक्स फाइलिंग में गलती हो जाए तो निवेशक को उसके निवेश पर टैक्स छूट का लाभ नहीं मिल पाता है। ऐसी समस्याओं से बचने के लिए जरूरी है कि कर छूट के लिए आवेदन करते समय प्रत्येक प्रक्रिया को लेकर बेहद सवाधान रहें। साथ ही पॉलिसी का प्रीमियम भी समय पर भरते रहें।


लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम पर हमेशा टैक्स छूट नहीं मिलती है। यदि इश्योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम की रसीद को टैक्स छूट के लिए फार्म के साथ सलग्न किया है तो यह देखना जरूरी होता है कि भरा गया प्रीमियम व्यक्ति ने खुद, पत्नी अथवा बच्चों की इंश्योरेंस पॉलिसी पर भरा हो, इसके अलावा किसी और की इश्योरेंस पॉलिसी का प्रीमियम भरने में कर छूट की सुविधा नहीं मिलती है। इसलिए यदि इंश्योरेंस प्रीमियम पर टैक्स छूट चाहते हैं तो पॉलिसी में भरा जानेवाला प्रीमियम खुद, पत्नी या फिर बच्चों के लिए ही होना चाहिए यह ध्यान रखना आवश्यक है।


इंश्योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम पर टैक्स छूट मिलने की भी एक सीमा है, करदाता को यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए। पॉलिसी प्रीमियम पर टैक्स छूट के भी कुछ नियम हैं जिसके तहत पॉलिसी का प्रीमियम समअश्योर्ड की रकम का 20 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। वहीं यदि प्रीमियम समअश्योर्ड की रकम का 20 फीसदी से ज्यादा होता है तो ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति कर छूट लाभ पाने योग्य नहीं होता है। करदाता को ध्यान रखना चाहिए की इंश्योरेंस में निवेश का नजारिया ना हो, जहां इंश्योरेंस केवल नाम के लिए हो और पॉलिसी पर ज्यादा ध्यान निवेश पर केंद्रित किया गया हो। ऐसे पॉलिसीधारकों को टैक्स छूट नहीं मिल पाती है।


वहीं इसके अलावा पॉलिसी प्रीमियम का भुगतान तय समय सीमा तक लगातार भरा जाना जरूरी है। समय पर प्रीमियम का भुगतान करने पर क्लेम में दिक्कतें नहीं आती है। सिंगल प्रीमियन पॉलिसी में कम से कम 2 साल तक प्रीमियम भरा जाना जरूरी होता है। वहीं वार्षिक प्रीमियम पॉलिसी में 3 साल तक प्रीमियम भरा जाना आवश्यक होता है। ऐसे में इंश्योरेंस पॉलिसी का प्रीमियम समय पर भरना जरूरी है ताकि टैक्स में छूट मिलने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर क्लेम मिलने में परेशानियों का सामना ना करना पड़े।


इस लेख के लेखक अर्नव पंड्या फाइनेंशियल प्लानर और चार्टेड अकाउंटंट हैं।