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जानिए मेडिकल इंश्योरेंस से जुड़ी बारीकियां

प्रकाशित Sat, 28, 2012 पर 14:40  |  स्रोत : Moneycontrol.com

पैसे की जरूरत तो वैसे हर चीजों के लिए पड़ती ही है। लेकिन अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी पैसा होना जरूरी माना जाता है। आज के युग में जहां हर काम को जल्दी निपटाने की चुनौती सामने है तो तनाव का सामना होना स्वाभाविक है। लिहाजा तवान भरी इस जिंदगी में बिना हेल्थ इंश्योरेंस के गुजारा करना संभव नहीं है। आपके संकट के समय में हेल्थ इंश्योरेंस एक सच्चे साथी के रूप में काम आता है।


हेल्थ इंश्योरेंस के अंतर्गत कैशलेस इंश्योरेंस प्रोडक्ट काफी अहम माने जाते हैं। ये प्रोडक्ट बीमारी के दौरान लोगों की वित्तीय परेशानियों को हल करने के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि ये प्रोडक्ट भी काम नहीं आते हैं। दरअसल कंपनियों की ओर से मेडिक्लेम पॉलिसी बेचने के समय दिए गए पेशकश मौके पर पूरे नहीं होते हैं और लोगों में नकारात्म भावना आ जाती है। यही वजह है कि इस लेख के जरिए हम आपको मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत कैशलेस पॉलिसी की बारिकियों से रूबरु करा रहे हैं।


कैशलेस इंश्योरेंस क्या है?


कैशलेस इंश्योरेंस के जरिए आपको और आपके परिवार को अस्पताल के खर्चों में सहूलियत मिलती है। लेकिन कैशलेस पॉलिसी को थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेशन (टीपीए) की मंजूरी जरूरी होती है।


समस्या


थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेशन ने पॉलिसी धारकों को कैशलेस की सुविधाएं देनी बंद कर दी हैं। अस्पतालों की ओर से भी पॉलिसी धारकों को कैशलेस की सुविधाएं देने से इंकार किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि इंश्योरेंस कंपनियों ने पहले का बकाया अब तक नहीं चुकाया है। इंश्योरेंस कंपनियों की दलील है कि बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने से काफी नुकसान झेलना पड़ा है। वहीं डॉक्टरों की दलील है कि कम कीमत पर इलाज करना संभव नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि लगातार प्रीमियम भरने के बावजूद पॉलिसी धारकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।


अस्पताल और टीपीए की ओर से सुविधाएं देने में आखिर टाल-मटोल क्यों?


साल 2012 की बात करें तो कैशलेस इंश्योरेंस फायदे का सौदा साबित हुआ था। पॉलिसीधारकों के साथ-साथ अस्पताल और डॉक्टरों को भी लाभ मिला था। इंश्योरेंस कंपनियों के खाते में भी ग्राहकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई थी। लेकिन समस्या शुरू हुई जब अस्पतालों ने ज्यादा बिल की वसूली का पैमाना अपना लिया। क्लेम की संख्या बढ़ने से इंश्योरेंस कंपनियों दिक्कत में आ गईं। नतीजा ये हुआ कि जुलाई 2010 में 4 सरकारी बीमा कंपनियों समेत 18 इंश्योरेंस कंपनियों ने अपनी लिस्ट से कई अस्पतालों को बाहर कर दिया। इस मुद्दे के उछलने के बाद इंश्योरेंस कंपनियों ने सीधे अस्पतालों और डॉक्टरों से फीस को लेकर पूछताछ करनी शुरू कर दी। हालांकि अस्पताल और डॉक्टरों ने इंश्योरेंस कंपनियों की इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया। यही अहम वजह रही कि अस्पतालों ने पॉलिसी धारकों को कैशलेस सेवाएं देनी बंद कर दी और पॉलिसी धारकों का इस उलझन का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ।


फिलहाल की स्थिति


इस उलझन को खत्म करने के लिए अगस्त 2010 में आईआरडीए ने पहल की। आईआरडीए ने सभी इंश्योरेंस कंपनियों को सर्कुलर जारी कर आगाह किया कि इस उलझन का असर मरीजों पर नहीं पड़ना चाहिए। आईआरडीए की पहल से अस्पतालों ने सशर्त कैशलेस सुविधाएं देनी शुरू कर दी।


आप क्या कर सकते हैं?


अगर आपको मेडिक्लेम पॉलिसी को लेकर कोई दिक्कतें हो रही हैं, तो आईआरडीए के साथ इंश्योरेंस ओम्बुडसमैन ऑफिस को चिट्ठी लिखकर समस्या का समाधान निकाल सकते हैं। इसके अलावा कंज्यूमर कोर्ट में टीपीए के खिलाफ केस भी दायर कर अपना हक हासिल कर सकते हैं।


मेडिकल इंश्योरेंस खरीदने से पहले इन मुद्दों पर गौर करें :


1. कैशलेस इंश्योरेंस से आपको सुकून जरूर मिलता है, लेकिन याद रहे कि वो भी इंश्योरेंस के नेटवर्क वाले अस्पताल में इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है।


2. अस्पताल में दाखिल होने की सूरत में रोजाना खर्च की शर्तें जांच लें।


3. इंश्योरेंस कंपनियां 100 फीसदी कैशलेस की सुविधा वाले प्लान मुहैया नहीं कराती हैं।


4. पॉलिसी खरीदने से पहले प्रीमियम की रकम का आकलन जान लें।


5. पॉलिसी में कैशलेस लेनदेन की सुविधा है या नहीं इसकी जांच करें। कई बार ऐसा होता है कि इंश्योरेंस कंपनियां कैशलेस सुविधाएं देने से मुंह मोड़ लेती हैं।


6. अपने पॉलिसी में किन बीमारियों का इलाज समावेश नहीं किया गया है और इलाज के खर्च की सीमा को अच्छी तरह से जांच लें। इसी सेक्शन से ज्ञात होता है कि आपको क्या हासिल होगा या नहीं होने वाला है।


ये लेख बैंक बाजार डॉट कॉम से साभार लिया गया है।