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हेल्थ इंश्योरेंस पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रकाशित Sat, 22, 2012 पर 08:46  |  स्रोत : Moneycontrol.com

भारत में बड़ी संख्या में लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस के महत्व और इसकी उपयोगिता को जाना है। वहीं अब लोग हेल्थ कवर लेने के लिए एक अच्छा बजट भी तैयार करने लगे हैं। हालांकि हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर जानकारियों का अभाव और मन में उठते कई प्रश्नों के चलते हेल्थ कवर लेने की इच्छा को कई लोग टाल देते हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इंश्योरेंस प्लान लेते समय कौन-कौन सवाल प्राय: सामने आते हैं।


हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी से क्या फायदा होगा


 इंश्योरेंस पॉलिसी में दुर्घटना होने या बीमारी के समय होने वाला अस्पपताल खर्च कवर हो जाता है। साथ ही इलाज के लिए आने-जाने  और होने वाले अन्य खर्चों  का कवर भी इंश्योरेंस पॉलिसी में हो जाता है।


प्री-हॉस्पिटलाइजेशन: इंश्योरेंस पॉलिसी में अस्पताल में भर्ती होने से पहले होने वाले खर्च का भुगतान किया जाता है।


पोस्ट-हॉस्पिटलाइजेशन: अस्पताल से निकलने के बाद भी होने अतिरिक्त दवाइयों इत्यादि पर होने वाला खर्च में पॉलिसीधराक को इंश्योरेंस पॉलिसी के माध्यम से मिल जाता है। साथ ही पॉलिसी में ऐसे मेडिकल खर्चों का भुगतान पॉलिसी धारक को किया जाता है, जिन बीमारियों में अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं होती है।


क्या इंश्योरेंस पॉलिसी से प्रीमियम में बदलाव होता है?


पॉलिसीधारक के मन में यह सवाल अक्सर आता है उसके द्वारा भुगतान किया जा प्रीमियम हर साल समान रहेगा या फिर इसमें कोई बदलाव होगा। वहीं मेडीक्लेम लेने या नहीं लेने पर प्रीमियम में बदलाव होता है या नहीं। ये ऐसे कई सामान्य सवाल हैं जो पॉलिसीधारक के मन में अक्सर आते रहते हैं।


इंश्योरेंस कंपनी के द्वारा हेल्थ इंश्योरेंस पर पॉलिसीधारक के उम्र की हिसाब से समान प्रीमियम लिया जाता है। जैसे 0-18 साल, 19-30 साल, 31-45 साल, 46-55 साल, 56-60 साल और 60 साल अधिक उम्र वालों से इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसीधारक की उम्र के मुताबिक प्रीमियम लेती है। वहीं पॉलिसीधारक एक उम्र समूह से उम्र के दूसरे समूह में प्रवेश करता है को उसकी पॉलिसी का प्रीमियम बढ़ जाता है। वहीं प्रीमियम भुगतान के साल में पॉलिसीधारक ने क्लेम लिया है को रिन्युअल होने वाले प्रीमियम की रकम  बढ़ जाती है, जिसे लोड प्रीमियम कहा जाता है।


इंश्योरेंस पॉलिसी लेते समय ध्यान रखने योग्य बातें-


1- पॉलिसी में उन अस्पतालों की सूची जांचें जिनसे इंश्योरेंस कंपनी सहबद्ध है।


2- पहले से मौजूद बीमारियों परक कवर देने में इंश्योरेंस कंपनी कितना वक्त लगाती है इसकी भी जांच करें


3- पॉलिसी में उप-भुगतान के विकल्प को भी जाचें, जिसके तहत कई बार बीमारी के कुल खर्च का कुथ हिस्सा पॉलिसी धारक


को ही वहन करना पड़ता है।


4- पॉलिसी में मिलने वाली छूट को भी पूरी जानकारियां पढ़ें, ताकि इंश्योरेंस कवर लेते समय किसी परेशानी का सामना ना करने पड़े।


क्या 1 इंश्योरेंस पॉलिसी ली जा सकती है?


पॉलिसीधारक 2 इंश्योरेंस प्लान इंश्योरेंस कंपनी से प्राप्त कर सकता है। वहीं दो इंश्योरेंस प्लान अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियों से लेना ज्यादा फायदेमंद होता है। जिसके तहत पॉलिसीधारक के पास क्लेम लेने के अधिक विकल्प उपलब्ध हो जाते हैं।


कैशलेस इंश्योरेंस प्लान क्या सभी को मिलता है, या इसके भी विकल्प हैं?


इंश्योरेंस पॉलिसी में कैशलेस जैसी सेवाएं और विकल्प मौजूद होते हैं। सरकारी इंश्योरेंस कंपनियां कैशलेस सेवा के विकल्प को चुनने पर पॉलिसीधारक को प्रीमियम में छूट भी देती हैं। हालांकि ज्यादातर पॉलिसीधारक इस सेवा का लाभ नहीं उठाते हैं।


जब इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम का भुगतान ना करें-


कई बार ऐसा देखा गया है कि पॉलिसीधारक को क्लेम लेने में कई परेशानी का सामना करना पड़ता है। हालांकि सभी इंश्योरेंस कंपनियां क्लेन सेटलमेंट के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन बार क्लेम सेटलमेंट की प्रक्रिया बड़ी जटिल हो जाती है। वहीं ऐसे मामलों के सख्ती से निपटारे के लिए बीमा नियामक आईआरडीए के कड़े नियम बनाए हैं। आईआरडीए इंटीग्रेटेड ग्रिवंसेस मैनेजमेंट सिस्टम (आईडीएमएस) का कार्यान्वयन करती है। आईएमएमएस को इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ कार्यवाही करने में मदद करती है। वहीं यदि जरूरत पड़ती है तो मामला आईआरडीए तक भी पहुंचा जाता है। वहीं पॉलिसीधारक आईआरडीए के कॉल सेंटर आईजीसीसी और आईआरडीए की साइट पर भी अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। आईजीसीसी का टोल फ्री नंबर 155255 है।


नोट: इस लेख के लेखक दीपक योहानन, मायइंश्योरेंसक्लब डॉट कॉम के सीईओ हैं।