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संपत्ति की खरीद-फरोख्त के समय ध्यान रखने योग्य बातें

प्रकाशित Thu, 05, 2010 पर 16:18  |  स्रोत : Hindi.in.com

05 अगस्त 2010

सीएनबीसी आवाज़



अगर आप भी संपत्ति खरीदते समय प्रापर्टी डीलर और बिल्डर के बताये मुश्किल नियमों और शर्तों से उलझन में पड़ जाते हैं तो ये लेख आपके काफ़ी काम आ सकता है क्योंकि इससे आपको संपत्ति से जुड़ी कुछ भारी भरकम शब्दावली का अर्थ समझने में सहायता मिल सकती है।


ये ऐसी बातें हैं जो आपको पता होनी चाहिये क्योंकि इनकी आवश्यकता आपको कागजी कार्रवाई करते समय होती है। यहां कुछ शब्दों और कानूनों का अर्थ दिया गया है जो संपत्ति की खरीद-फरोख्त करते समय आपके काम आएंगे।



1) सेलेबल या सुपर बिल्ट अप एरिया: कार्पेट एरिया, दीवार की मोटाई और कॉमन एरिया को शामिल कर सेलेबल या सुपर बिल्ट अप एरिया निकाला जाता है। मुंबई में आमतौर पर बिल्डर 60 से 100% तक कार्पेट एरिया जोड़कर सेलेबल या सुपर बिल्ट अप एरिया बताते हैं।



2) टाइटल सर्टिफिकेट:
टाइटल सर्टिफिकेट वकील द्वारा जारी किया जाता है। इस सर्टिफिकेट के जरिए प्रॉपर्टी के पहले खरीदार से लेकर मौजूदा वक्त में प्रॉपर्टी किसके कब्जे में है इस बात का पता चलता है। इसका इस्तेमाल प्रॉपर्टी पर विक्रेता का हक बताने के लिए किया जाता है। इस सर्टिफिकेट को ध्यान से जांचना जरूरी है क्योंकि इसमें प्रॉपर्टी से जुड़ी अहम जानकारियों के अलावा, उससे जुड़ी समस्याओं और मुकदमों का जिक्र होता है।




3) कलेक्टर लैंड: कलेक्टर लैंड के तहत वो जमीन शामिल की जाती है जो लैंड रिकार्ड्स में कलेक्टर के पास हो और जिस पर कलेक्टर का हक हो। कलेक्टर चाहे तो गरीब तबके के लिए ऐसी जमीन सस्ते दाम पर या मुफ्त में हाउसिंग सोसायटी के लिए दे सकता है।




4) गवर्नमेंट लैंड: गवर्नमेंट या सरकारी जमीन में वो जमीनें शामिल होती हैं जो लैंड रिकार्ड्स में स्टेट या सेंट्रल गवर्नमेंट के नाम दर्ज हों। सरकार चाहे तो गरीब तबके के लिए ऐसी जमीन सस्ते दाम पर या मुफ्त में हाउसिंग सोसायटी के लिए दे सकती है।




5) महाराष्ट्र में नॉन ऑक्युपेंसी चार्ज : नॉन ऑक्युपेंसी चार्ज सोसायटी उन सदस्यों से वसूलती है जिन्होंने अपनी प्रॉपर्टी किराए पर दी हो। हाउसिंग सोसायटी या रिर्हौंाशी प्रॉपर्टी के लिए सोसायटी सर्विस चार्ज से केवल 10% ज्यादा रकम नॉन ऑक्युपेंसी चार्ज के तौर पर ले सकती है। कमर्शियल प्रॉपर्टी या कमर्शियल सोसायटी के लिए नॉन ऑक्युपेंसी चार्ज की कोई सीमा तय नहीं है।



6) महाराष्ट्र में ट्रांसफर प्रीमियम: प्रॉपर्टी ट्रांसफर के वक्त सोसायटी ट्रांसफर प्रीमियम चार्ज करती है। प्रीमियम की रकम सोसायटी के फैसले के मुताबिक 0 से लेकर 25 हजार रु तक हो सकती है, इससे ज्यादा ट्रांसफर प्रीमियम मांगना कानूनी तौर पर गलत है।



7) महाराष्ट्र में ट्रांसफर फीस :  नए नियम के तहत प्रॉपर्टी ट्रांसफर के वक्त फीस के तौर पर सिर्फ 500 रु लिये जा सकते हैं हालांकि खरीदार की मृत्यु के बाद प्रॉपर्टी ट्रांसफर करते वक्त ये नियम लागू नहीं होगा।




8) महाराष्ट्र में एडमिशन फीस :  नए नियम के तहत प्रॉपर्टी ट्रांसफर या खरीदार की मृत्यु के बाद प्रॉपर्टी ट्रांसफर का म्युटेशन करते वक्त या दोनों ही वजहों पर 100 रु फीस देनी होगी।



9) एमएओए यानि महाराष्ट्र अपार्टमेंट ओनरशिप एक्ट 1970: अपार्टमेंट ओनरशिप एक्ट, कोऑपरेटिव सोसायटी से मिलता जुलता एक्ट है। इस एक्ट के तहत प्रत्येक खरीदार का उसकी प्रॉपर्टी के अलावा कॉमन एरिया में भी अविभाजित हिस्सा होता है। ये एक्ट वहां इस्तेमाल होता है जहां खरीदारों की संख्या 10 से भी कम होने की वजह से सोसायटी नहीं बनायी जा सकती।