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सोने का भारत पर क्या है नकारात्मक असर

प्रकाशित Fri, 01, 2013 पर 17:27  |  स्रोत : Moneycontrol.com

दुनिया में सोने की खपत वाला भारत सबसे बड़ा देश है। भारत का सोने से लगाव बहुत बहुत पुराना है। दुनिया में सोने की खदानों का अमूमन 33 फीसदी या 700 टन सोना भारत में खपा लिया जाता है। ये भारत को दुनिया का सबसे बड़ा सोने का आयातक बनाता है।


अगर इतनी बड़ी मात्रा में खाने की चीजों का आयात होता तो भी ये बात समझने वाली हो सकती थी क्योंकि ये लोगों के पेट भरने के काम आता। लेकिन इतने सोने का क्या उपयोग है। हमारे पास शायद इसका कोई साफ जवाब नहीं होगा लेकिन परंपरागत रुप से हम लगातार सोना खरीदते आ रहे हैं।


आइये कुछ आधारभूत बातें जानते हैं। दुनिया में पैदा होने वाले सोने का अमूमन 52 फीसदी गहने बनाने में प्रयोग होता है। 12 फीसदी का उपयोग उद्योगों में होता है, 18 फीसदी निवेश होल्डिंग (गोल्ड ईटीएफ आदि) में उपयोग होता है और बचा हुआ 18 फीसदी सेंट्रल बैंकों के पास रखा हुआ है।


दुनिया की 52 फीसदी गहनों की खपत में से ज्यादातर खपत भारत में होती है। साधारणतया एक मध्यम वर्गीय व्यक्ति अपने पूरे जीवन में करीब 15-18 लाख रुपये के सोने के गहने खरीदता है।


भारतीय इतने गहने क्यों खरीदते हैं?


इसके पीछे का मूल कारण भारतीय पंरपराओँ में छुपा हुआ है और खासकर शादी में। हमारी परंपराओं में बहुत से बदलाव आए हैं लेकिन शादी विवाह के मौके पर सोना खरीदने की परंपरा में अभी भी बहुत बदलाव नहीं आया है। हालांकि नई पीढी को सोना पहनने का इतना शौक नहीं है फिर भी सोने की मांग में ज्यादा गिरावट नहीं आई है। हमारे देश में हर साल करीब 950 टन सोने की मांग देखी जाती है।


हम इस परंपरा को क्यों बरकरार रखना चाहते हैं?


हम में से बहुत से लोग इसका महंगाई से जुड़ा रिश्ता नहीं समझ पाते हैं लेकिन इतना जानते हैं कि सोना पैसे बचाने का एक अच्छा विकल्प है। पैसे तब बचते हैं जब आपके निवेश की राशि महंगाई की दर से ज्यादा दर से बढ़े। सोने ने ऐसा सालों से किया है। इसलिए भारतीय महंगाई को हराने के लिए सोने में निवेश को अच्छा विकल्प मानते हैं। अन्य निवेश विकल्प जैसे रियल एस्टेट और इक्विटी आम आदमी की पहुंच से बाहर होते हैं इसलिए वो सोने को निवेश विकल्प मानकर इकट्ठा करते रहते हैं। सोने में निवेश का एक फायदा ये हैं कि इसे पहना भी जा सकता है।


तो इसमें परेशानी क्या है?


सरकार परेशान क्यों होती है जब हम सोने को खरीदकर पैसा बचा रहे हैं या पैसा बना रहे हैं। अकेले स्तर पर सोना खरीदना काफी फायदेमंद हो सकता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ये चिंताजनक बात हो सकती है। इसे जानने के लिए हमें थोड़ा विस्तार में समझना होगा।


इतना सोना आता कहां से है? दुनिया में सोने का उत्पादन करने वाले 5 सबसे बड़े देशों में चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और रुस हैं। भारत में सोने की खपत तो ज्य़ादा है लेकिन देश में सोने का उत्पादन ज्यादा नहीं होता है। इसका मतलब है कि हमें इन देशों से सोना खरीदना पड़ता है। सोने का कुल आयात में 12 फीसदी हिस्सा है और इसका नंबर केवल क्रूड और कैपिटल गुड्स के बाद आता है। इसमें मुख्य परेशानी फॉरेक्स की है और आप जब जानेंगे कि मुख्य परेशानी क्या है तो हैरान रह जाएंगे। जब हम विदेश से सोना खरीदते हैं तो हमें विदेशी मुद्रा में भुगतान करना होता है और हमें करीब 6000 करोड़ डॉलर की जरूरत पड़ती है। इसका सीधा नकारात्मक असर रुपये पर होता है इसके बाद खासतौर पर पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ते हैं।


सोने का देश की अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा अच्छा ना होने का एक बड़ा कारण है कि ये अनुत्पादक प्रकृति का है। सोना कुछ करता नहीं है लेकिन घरों और बैंकों के लॉकर में बेकार पड़ा रहता है। इसकी तुलना में अन्य वित्तीय साधन जैसे फिक्सड डिपॉजिट, निवेश पॉलिसियां, शेयर, बॉन्ड आदि सरकार और कॉर्पोरेट संस्थानों के लिए उत्पादक फंड पैदा करते हैं जो अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर डालता है।


सोने के ज्यादा आयात से सरकार घबरा जाती है। सरकार सोने के आयत को कम करना चाहती है ओर इसलिए सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा देती है। हम देख सकते हैं कि इससे बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता है और लोग वैल्थ बनाने के लिए सोने की बढ़ी कीमतों को भी झेल जाते हैं।


इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी से स्मगलिंग को बढ़ावा मिलता है और काले धन में बढ़त होती है। अगर वित्त मंत्री खुले तौर पर घोषणा कर दें कि अमुक तारीख से सोने की इंपोर्ट ड्यूटी में गिरावट लाई जाएगी तो लेग उस समय तक सोने में निवेश करने को टाल देते हैं।


निवेशकों के लिए रास्ता


हमारा ये सुझाव नहीं है कि आप निवेश के लिए सोने का एकदम बायकॉट कर दें लेकिन इतना ध्यान रखें कि ये आप के कुल निवेश पोर्टफोलियो का 15 फीसदी से ज्यादा ना हो। और फिजिकल गोल्ड खरीदने की बजाए आप गोल्ड ईटीएफ और गोल्ड म्यूचुअल फंड में निवेश करें।


इस लेख के लेखक कृपानंदा चिदंबरम हैं।