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निवेश के लिए एनसीडी, एफडी में से क्या चुनें

प्रकाशित Tue, 10, 2013 पर 12:07  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पूंजी जुटाने के लिए कंपनियां इन दिनों मार्केट में नॉन- कनवर्टिबल डिबेंचर्स यानी एनसीडी लॉन्च कर रही हैं। लेकिन इन्वेस्टर के सामने दिक्कत ये है कि वो इन डिबेंचर्स में निवेश करें या नहीं। इंवेस्ट ऑनलाइन डॉटइन के अभिनव एंग्रिश ने इस पर कुछ जानकारी दी है।


एनसीडी यानी नॉन- कनवर्टिबल डिबेंचर्स हैं जो फिक्सड रिटर्न इंस्ट्रूमेंट हैं, ये कभी कनवर्ट होकर इक्विटी नहीं बनते हैं। बाजार में फिलहाल जो एनसीडी आ रहे हैं उनमें फिक्स्ड डिपॉजिट से ज्यादा रिटर्न मिलते हैं। एफडी के मुकाबले एनसीडी होल्डर को कंपनी के ऐसेट्स पर अधिकार मिलता है जो एफडी होल्डर को नहीं मिलता है।


अभिनव एंग्रीश के मुताबिक एनसीडी 2 तरह के होते हैं। सिक्योर्ड एनसीडी और अनसिक्योर्ड एनसीडी। एनसीडी कौनसा चुनें इसके लिए उसकी रेटिंग देखनी चाहिए। एनसीडी में निवेशको के पास लिक्विडिटी रहती हैं क्योंकि एनसीडी लिस्ट होते हैं जबकि फिक्स्ड डिपॉजिट लिस्ट नहीं होते हैं। एनसीडी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट किए जा सकते हैं और शेयर बाजार में इसका कारोबार हो सकता है। इसमें प्राइस मूवमेंट एनसीडी जारी करने वाली कंपनी या इंटरेस्ट के मूवमेंट के आधार पर होता है। एफडी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट नहीं होता है।


एनसीडी में समय अवधि देखना जरूरी है और लंबी अवधि में ये फिक्सड डिपॉजिट से बेहतर रिटर्न देते हैं।


एनसीडी का जोखिम रेटिंग पर निर्भर करता है। रेटिंग जितनी कम, जोखिम उतना ही ज्यादा होता है। हालांकि जिसमें ज्यादा जोखिम होता है ब्याज भी उस पर ज्यादा होता है। एनसीडी में कम रेटिंग पर ज्यादा जोखिम और ज्यादा इंटरेस्ट मिलता है। एनसीडी सिक्योर्ड और अनसिक्योर्ड दो तरह के होते हैं।


वहीं बैंकों की एफडी स्कीम की रेटिंग नहीं की जाती है। एनबीएफसी की स्कीम की रेटिंग जरूर होती है। कम रेटिंग का मतलब अधिक जोखिम पर अधिक इंटरेस्ट मिलता है। बैंक एफडी में फिक्स इंटेरेस्ट है और जोखिम नहीं है। एक लाख रुपये तक मूल रकम इंश्योरेंस के रुप में रहती है।


एनसीडी की निवेश की अवधि 3-5 साल तक होती है और इसमें इंटरेस्ट मासिक, तिमाही, सालाना या फिर मैच्योरिटी पर  मिलता है।


एफडी की निवेश की अवधि कुछ हफ्तों से लेकर 10 साल तक होती है और इंटरेस्ट मासिक, तिमाही, सालाना या फिर मैच्योरिटी पर मिलता है। एनसीडी में इंटरेस्ट रेट फिक्स नहीं होता है जबकि एफडी में इंटरेस्ट रेट फिक्स होता है।


एनसीडी में इंटरेस्ट इनकम पर स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है लेकिन इंटरेस्ट पर टीडीएस नहीं कटता है। शेयर बाजार पर इसकी खरीद-बिक्री होती है, इसलिए शॉर्ट टर्म या फिर लांग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है।


वही एफडी में 5 साल या उससे अधिक की एफडी स्कीम पर इनकम टैक्स छूट मिलती है। सालाना दस हजार या उससे अधिक के इंटरेस्ट पर टीडीएस कटता है। 


एनसीडी जब सब्सक्रिप्शन के खुला हो तभी निवेश किया जा सकता है, शेयर बाजार में मैच्योरिटी से पहले इसे बेच सकते हैं। इसके लिए डीमैट अकाउंट की जरूरत पड़ेगी।


बैंक एफडी स्कीम में कभी भी निवेश कर सकते हैं। मैच्योरिटी से पहले पैसे निकालने पर आपको मामूली जुर्माना देना पड़ सकता है।


एनसीडी लंबी अवधि के नजरिए और जिनमें जोखिम उठाने की क्षमता हो, उनके लिए सही विकल्प है। वहीं एफडी छोटे निवेशकों और कम जोखिम उठाने वालों के लिए सही विकल्प है।


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