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प्री एक्जिस्टिंग डिजीज क्लेम से जुड़ी जानकारी

प्रकाशित Mon, 06, 2010 पर 16:55  |  स्रोत : Hindi.in.com

6 सितंबर 2010

सीएनबीसी आवाज़


पॉलसी बेचते वक्त स्वास्थय बीमा कंपनियां काफी लंबे-चौड़े वादे करती हैं। हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय आपको इस बात का यकीन दिलाया जाता है कि क्लेम का भुगतान फटाफट हो जाएगा और वो भी कम से कम कागजी कार्रवाई पर, लेकिन जब असल में क्लेम देने की बारी आती है तो कंपनियां कोई न कोई बहाना खोजकर क्लेम देने से मुकर जाती हैं और आप मुश्किल में फंस जाते हैं।



हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां प्री एक्जिस्टिंग डिजीज के सबसे ज्यादा दावे अस्वीकार करती हैं। पहले से मौजूद बीमारियों के नाम पर ग्राहकों और कंपनियों के बीच अक्सर विवाद होता रहता है। हेल्थ इंश्योरेंस के बारे में अपना पैसा .कॉम के हर्ष रूंगटा ने कुछ उपयोगी जानकारी दी हैं।



कुछ स्वास्थय बीमा कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी देते समय आपका मैडिकल चैकअप नहीं करती। इसके आधार पर आपको शुरूआती पॉलिसी प्रीमियम तो कम देना होता है पर भविष्य में अगर ऐसी कोई बीमारी होती है जो प्री एक्जिस्टिंग डिजीज की परिभाषा के तहत आती हैं तो आपको उस समय भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। आपको राय दी जाती है कि मैडिकल चैकअप के बाद पॉलिसी देने वाली कंपनी के पास जाना ही बेहतर विकल्प है।



आमतौर पर कंपनियां 40 से 45 साल से पहले स्वास्थ्य पॉलिसी लेने वाले लोगों का मैडिकल चैकअप नहीं करती हैं।



सबसे पहले आपको जानना चाहिए कि कंपनियां प्री एक्जिस्टिंग डिजीज के मामले में क्लेम देने से क्यों मुकर जाती हैं ? कुछ बीमा कंपनियों के मुताबिक चाहे आपको बीमारी के बारे में पहले से पता था या नहीं, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है। प्री एक्जिस्टिंग डिजीज होने की सूरत में आपको या तो पॉलिसी देने से इंकार कर सकती हैं या फिर उन बीमारियों के लिए भी आपसे प्रीमियम की मांग कर सकती हैं जो प्री एक्जिस्टिंग डिजीज के कारण भविष्य में आपको हो सकती हैं।
 



इन परेशानियों से बचने के लिये आपको इस बात के सुझाव दिए जाते हैं कि पॉलिसी लेते समय फॉर्म भरते समय ही सभी जानकारी साफ-साफ दें जिससे कंपनी आपकी आवश्यकता के अनुसार ही आपको ऐसा हेल्थ इंश्योरेंस उत्पाद उपलब्ध कराये जो जरूरत पड़ने पर धोखा ना दे। अगर आप अपनी बीमारी छुपाते हैं तो भी बीमा कंपनी मैडिकल तकनीक के सहारे ये पता लगा सकती है कि आपको प्री एक्जिस्टिंग डिजीज थी या नहीं।


उन्होंने कुछ कंपनियों के नाम बताए जो प्री एक्जिस्टिंग डिजीज होने की सूरत में अतिरिक्त प्रीमियम लेकर भी पॉलिसी देती हैं। जैसे युनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस की पॉलिसी में डाइबिटीज, ब्लड प्रैशर के शिकार लोगो के लिए भी अलग से उत्पाद हैं।



इसके अलावा स्टार हेल्थ की भी एक पॉलिसी है जो मधुमेह के मरीजों को भी पॉलिसी देती है और इससे भविष्य में होने वाली बीमारियों पर भी कवर देती है।



हेल्थ इंश्योरेंस का हर साल नवीनीकरण कराना जरूरी होता है ताकि आपको पॉलिसी के अधिकतम फायदे मिल सकें।


हर्ष रूंगटा ने बताया कि अगर आपको पॉलिसी लेते समय प्री एक्जिस्टिंग डिजीज थी तो ही आप इस नियम के अंदर आ जाते हैं अगर आपको पॉलिसी लेने के बाद कोई बीमारी होती है तो वो प्री एक्जिस्टिंग डिजीज के तहत नहीं मानी जाएगी।


उन्होंने बताया कि अक्सर ग्रुप इंश्योरेंस में कंपनियां अपने कर्मचारियों का जो स्वास्थय बीमा कराती हैं उसमें प्री एक्जिस्टिंग डिजीज को भी कवर किया जाता है पर व्यक्तिगत रूप से पॉलिसी लेने में अभी भी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कैशलेस विवाद में भी इसी बात को उठाया गया है कि ग्रुप इंश्योरेंस के कारण क्लेम होने की सूरत में बीमा कंपनियों को काफी नुक्सान उठाना पड़ रहा है।
 

अगर आपको पहले से कोई बीमारी नहीं थी लेकिन पॉलिसी लेने के बाद अगर आपको बीमारी हो जाती है और उसका इलाज कराने के बाद आप क्लेम करते हैं तो कंपनी क्लेम देने से इंकार नहीं कर सकते। हां कंपनियों के पास आपका अगला प्रीमियम बढ़ाने का विकल्प रहता है जिसे आपको देना होगा। इरडा के नियमों के तहत ये नियम पॉलिसीधारक और बीमा कंपनी दोनों पर लागू होता है।

हर्ष रूंगटा ने कुछ हेल्थ प्लान बताए जो उनके अनुसार अच्छे हैं।



आईसीआईसीआई लौंबार्ड फैमिली फ्लोटर- इसका कवर 3 साल का होता है। इसका प्रीमियम 11,225 रुपये है और 70 साल तक इसे रिन्यू करा सकते हैं।


भारती एक्सा स्मार्ट हेल्थ प्रीमियम प्लान इसमें भी 3 साल का कवर मिलता है। इसका प्रीमियम 11,809 रुपये है और 70 साल तक इसे रिन्यू करा सकते हैं।


अपोलो म्यूनिख की इजी हेल्थ इंडीविजुअल इसका प्रीमियम 14,890 रुपये है और कवर की समय सीमा 3 साल है। इसमें लाइफटाइम रिन्यूअल की सुविधा मिलती है।


पूरी जानकारी के लिए वीडियो जरूर देखें