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पहला कदमः जानें वायदा बाजार की एबीसीडी

प्रकाशित Sat, 06, 2016 पर 12:04  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सीएनबीसी आवाज़ की फाइनेंशियल लिटरेसी की मुहिम पहला कदम के इस सीरीज में अब हम पहुंच गए हैं आखिरी पड़ाव पर। हमने कोशिश की कि बचत, फाइनेंशियल प्लानिंग, निवेश, म्युचुअल फंड्स और शेयर बाजार की बारीकियों और उलझनों को आपको आपकी अपनी भाषा में समझाया जाएं। उम्मीद है कि हमारी ये कोशिश कामयाब रही होगी। अगर फिर भी आपके जेहन में कुछ सवाल उठ रहे हों तो आप हमें सवाल भेज सकते हैं हमारी वेबसाइट pehla kadam.in पर। आप पहला कदम के फेसबुक पेज पर भी हमें लिख सकते हैं साथ ही हमें एसएमएस के जरिए अपना संदेश पहुंचा सकते हैं। आज के इस पेशकश में हम बात करने जा रहे हैं डेरिवेटिव्स, फ्यूचर और ऑप्शंस की और हमारे साथ हैं सीएनबीसी-आवाज़ के मार्केट एडिटर अनिल सिंघवी।


वायदा बाजार क्या है


भविष्य में नियत तारीख तक ट्रेडर्स की ओर सौदा सेटल करने के वादे को वायदा बाजार कहते हैं। वायदा बाजार में एक निश्चित तारीख पर सौदे के सेटलमेंट किेए जाते हैं। वायदा बाजार में सौदे आम तौर पर एक महीने में सेटल हो जाते हैं। वायदा बाजार में कीमतें मांग और सप्लाई के नियम से तय होते हैं। हर महीने के आखिरी गुरूवार को सेटलमेंट होते हैं। सेटलमेंट की तारीख को एक्सपायरी डेट कहा जाता है। ट्रेडर्स चाहें तो अपने सौदे को अगले महीने के लिए रोल ओवर भी कर सकते हैं। वायदा बाजार 2 तरह से होता है - फ्यूचर और ऑप्शन।


डेरिवेटिव क्या है


वायदा बाजार में डेरिवेटिव्स में कारोबार होता है। डेरिवेटिव्स में स्टॉक्स, इंडेक्स, मेटल, गोल्ड, क्रूड, करेंसी शामिल है। वायदा कारोबार में ट्रेडिंग के लिए कोई एक डेरिवेटिव होना जरूरी है।


फ्यूचर क्या है


कम पैसे में बाजार में ट्रेडिंग फ्यूचर के जरिए मुमकिन है। मार्जिन मनी जमा करने पर ही ट्रेडिंग की जा सकती है। मार्जिन एक्सचेंज तय करता है। फ्यूचर ट्रेडिंग महीने भर के लिए होती है। फ्यूचर ट्रेड में हर दिन का नफा-नुकसान का हिसाब किताब होता है। नुकसान होने पर ब्रोकर की भरपाई ट्रेडर को करनी पड़ती है। फ्यूचर कारोबार इंडेक्स या स्टॉक्स में होता है। फ्यूचर कैश मार्केट के मुकाबले प्रीमियम पर ट्रेड करते हैं। फ्यूचर अनुभवी ट्रेडर्स का काम है। फ्यूचर हेजिंग में भी काम आता है।


ऑप्शन क्या है


ऑप्शन में ट्रेडर्स के पास ट्रेडिंग के कुछ विकल्प होते हैं। ऑप्शन ट्रेडिंग की 1 सीरीज 1 महीने की होती है। ऑप्शन में शेयर,उनकी संख्या, प्राइस पहले से तय हो जाती है। लेकिन ट्रेडिंग का वक्त तय नहीं होता है। ऑप्शन में ट्रेडिंग 1 महीने में कभी भी हो सकती है। ऑप्शन 2 तरह के होते हैं - बायर ऑप्शन और सेलर ऑप्शन। ऑप्शन बायर के पास कई राइट्स होते हैं। जबकि इन राइट्स के बदले प्रीमियम मिलता है। ऑप्शन बायर को इन राइट्स के लिए प्राइस चुकानी पड़ती है। साल में ऑप्शन ट्रेडिंग की 12 सीरीज होती हैं। अक्सर 9-10 सीरीज में फायदा ऑप्शन सेलर को ही होता है। ऑप्शन सेलर ज्यादा स्मार्ट माने जाते हैं


इंडेक्स में फ्यूचर ट्रेडिंग

इंडेक्स में सेसेंक्स और निफ्टी शामिल हैं। निफ्टी फ्यूचर्स में ट्रेडिंग ज्यादा होता है। सीरीज खत्म होने के दिन फ्यूचर्स और स्पॉट के भाव बराबर हो जाते हैं। इंडेक्स फ्यूचर्स की भारत में डिलीवरी सेटल नहीं होती है। स्टॉक फ्यूचर्स की डिलीवरी मुमकिन है। इंडेक्स फ्यूचर्स हमेशा कैश सेटल होते हैं। इंडेक्स फ्यूचर्स की दिशा तय करने में टेक्निकल और फंडामेंटल बड़ा असर डालते हैं।


इंडेक्स फ्यूचर्स में ट्रेड के फायदे


इंडेक्स फ्यूचर्स को ट्रैक करना आसान होता है। कम पैसे में ज्यादा बड़ा ट्रेड मुमकिन है। इंडेक्स फ्यूचर्स में मार्जिन भी कम है। निफ्टी फ्यूचर्स का मार्जिन केवल 7-8 फीसदी होता है। बैंक निप्टी फ्यूचर्स में काफी वॉल्यूम मिलता है। आईटी इंडेक्स में भी काफी ट्रेड होता है।


स्टॉक फ्यूचर्स क्या हैं


फ्यूचर्स में ट्रेड होने वाले शेयरों को स्टॉक फ्यूचर्स कहते हैं। इन शेयरों की लिस्ट एक्सचेंज तैयार करते हैं। सेबी की मंजूरी के बाद ही शेयर फ्यूचर्स में ट्रेड हो सकते हैं। मार्केट कैप, वॉल्यूम और लिक्विडिटी देखकर शेयर स्टॉक फ्यूचर्स में शामिल किए जाते हैं। फिलहाल 250 शेयर स्टॉक फ्यूचर्स में ट्रेड करते हैं। कम पैसे में बड़ी पोजिशन स्टॉक फ्यूचर्स में संभव है। एफआईआई, घरेलू संस्थागत निवेशक स्टॉक फ्यूचर्स में ज्यादा निवेश करते हैं। फ्यूचर्स में हमेशा लॉट साइज में ट्रेडिंग होती है। कम से कम 1 लॉट खरीदना जरूरी है। लॉट की वैल्यू आमतौर पर लगभग 5 लाख रुपये होती है। वॉल्यूम और लिक्विडिटी के चलते बड़े निवेशक स्टॉक फ्यूचर्स में निवेश करते हैं।


ऑप्शन में ट्रेडिंग


ऑप्शन में ट्रेडिंग दो तरह से होता है कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन। ऑप्शन में बायर यानि खरीदार और सेलर यानि विक्रेता होते हैं। बायर राइट्स खरीदता है, सेलर राइट्स बेचता है। बदले में सेलर को प्रीमियम दिया जाता है। ऑप्शन में ट्रेडिंग प्रीमियम की होती है। खरीदने का राइट को कॉल ऑप्शन कहते हैं। बिकवाली के राइट मांगने को पुट ऑप्शन कहा जाता है। ऑप्शन में सौदे प्रीमियम के लिए होते हैं। ऑप्शन में अलग-अलग स्ट्राइक प्राइस होती है।
 
वायदा बाजार में रिस्क फैक्टर


वायदा बाजार में ट्रेडिंग से पहले रिसर्च करें, क्योंकि वायदा बाजार में रिस्क ज्यादा होता है। ट्रेडिंग से पहले आरडी डॉक्यूमेंट पर दस्तखत करने होते हैं। शॉर्ट सेलिंग में रिस्क ज्यादा होता है। शॉर्ट सेलिंग ज्यादा अनुभवी लोगों का काम करता है। कैश मार्केट के मुकाबले वायदा कारोबार में रिस्क ज्यादा होता है। वायदा बाजार में ज्यादा रिस्क, ज्यादा मुनाफा होता है। निवेशक ट्रेडिंग की शुरुआत वायदा कारोबार से ना करें, बल्कि कैश मार्केट से करें। क्योंकि नुकसान होने पर एक्सट्रा मार्जिन भरना पड़ सकता है। वायदा कारोबार में ट्रेडर्स के पास लिक्विडिटी होना जरूरी है। ज्यादा उतार-चढ़ाव होने पर एक्सचेंज मार्जिन बढ़ा देते हैं।


वायदा कारोबार में एहतियात


वायदा कारोबार में ट्रेडिंग करते वक्त स्टॉप-लॉस का ख्याल रखें। बड़ी घटनाओं के वक्त ट्रेड ना करें। बड़ी घटनाओं के वक्त ट्रेड करते वक्त ऑप्शन में ट्रेडिंग करें। कैश मार्केट ट्रेडिंग पैटर्न सीखने के बाद ही वायदा कारोबार में आएं। शुरुआत इंडेक्स से करें। इंडेक्स में भी ऑप्शन से ट्रेडिंग शुरु करें। शुरुआत में 1 लॉट से ट्रेडिंग करें। शुरुआत में सीखने के हिसाब से ट्रेडिंग करें। निफ्टी के ऑप्शन में ट्रेडिंग अच्छा विकल्प है।


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