Moneycontrol » समाचार » आईपीओ - क्लासरूम

आईपीओ: इन बातों का रखें ध्यान

प्रकाशित Sun, 17, 2010 पर 16:59  |  स्रोत : Hindi.in.com

moneycontrol.com


प्राइस डाटाबेस के पृथ्वी हल्दिया का कहना है कि यदि आप आईपीओ में निवेश करना चाहते हैं, तो आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और एक सूज्ञ निवेशक बनना होगा।



हल्दिया आगे बताते हैं कि आईपीओ के ऑफर डॉक्यूमेंट को सावधानी के साथ पढ़ें। संग्रहित विवरण-पुस्तिका को पढ़ने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लिहाजा कंपनी या लीड मैनेजर से विवरण-पुस्तिका की संपूर्ण कॉपी की मांग करें। संग्रहित विवरण-पुस्तिका में उनके ई-मेल आईडी का विवरण दिया रहता है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो सेबी से शिकायत कीजिए।



इस पुस्तिका में पढ़ने के लिए बहुत सारी सामग्री का समावेश किया रहता है, इसलिए प्रमुख मुद्दों पर नजर बनाएं और निम्मलिखित सवालों के जवाब जानने की कोशिश करें...


क्या यह आईपीओ है या एफपीओ?



प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ में कंपनी कीमतों को तय करती है और इसके साथ ही सेकंडरी मार्केट अधिकतम जानकारी एवं विश्लेषण करने के बाद लिस्टिंग से पहले सही कीमतों का पता लगाने का काम करता है।



एफपीओ में कीमतें पहले से ही तय रहती हैं, जबकि लाभ या नुकसान मामूली हो सकते हैं और बाजार के लिए विश्लेषण करने के लिए कोई नई जानकारी उपलब्ध करने की जरूरत नहीं पड़ती है।


क्या यह फिक्सड-प्राइस या बुक-बिल्डिंग इश्यू है?



कार्यप्रणाली, निवेशकों की श्रेणी और इश्यू की कीमतें पूरी तरह विभिन्न होते हैं। फिक्सड-प्राइस इश्यू में बुक या प्राइस की जानकारी हासिल करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है। फिक्सड-प्राइस इश्यू में एफआईआई और एचएनआई के लिए किसी प्रकार का आरक्षण नहीं होता है; छोटे निवेशकों के लिए इश्यू का 50 फीसदी हिस्सा आरक्षित होता है (बुक बिल्डिंग इश्यू में यह सीमा 35 फीसदी होती है)। आमतौर पर फिक्सड-प्राइस इश्यू छोटे होते हैं।


क्या प्रमोटर यानी प्रवर्तक “अच्छे” होते हैं?



प्रमोटर को जानने के लिए अलग एक अलग तरकीब है। यदि प्रमोटर ठीक-ठाक है, तो लगभग अन्य सभी घटकों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। यदि कोई जाना-माना विदेशी साझेदार है तो यह मददगार साबित हो सकता है।


प्रमोटरों की पृष्ठभूमि और अनुभव कैसा है?
समतुल्य कारोबार या उद्योग(निजी हिस्सेदारी/कंपनी की हिस्सेदारी) का अनुभव


क्या प्रमोटर भरोसेमंद है या उसके पास पर्याप्त संपत्ति है?



क्या कंपनी या इसके प्रमोटर के खिलाफ कोई धोखाधड़ी या अदालती मामला तो दर्ज नहीं है।
व्यक्ति या कंपनी जिनके ऊपर जमीन के मामले की शिकायत दर्ज नहीं है तो इन पर भरोसा किया जा सकता है।
यदि आपको कई प्रकार की धोखाधड़ी या अदालती मामले या फिर किसी गंभीर मामले की शिकायत यानी प्रमोटर के खिलाफ आपराधिक मामले चलने की जानकारी मिलती है।



ऐसे में कंपनियों और व्यक्ति के निजी पिछले आपराधिक मामलों की जानकारी हासिल करने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट वॉचआउटइन्वेस्टर्स डॉट कॉम पर जाएं।


इश्यू जारी करने वाली कंपनी स्थिति कैसी है?



होल्डिंग कंपनी/प्रमुख कंपनी

कंपनी का पिछला प्रदर्शन कैसा रहा है?



क्या कंपनी के वित्तीय परिस्थितियां, खासकर हाल के नतीजे विश्वासजनक हैं?



नतीजों को परखने के लिए कई चीजों पर ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि बिक्री के आंकड़ों में प्रायः विविध देनदारियों का भी समावेश रहता है तथा मुनाफे के आंकड़ों में इजाफा तो देखने को मिल जाएगा लेकिन यह अन्य आय या गैर-परंपरागत आय से बढ़ा मुनाफा है इसका ध्यान देना जरूरी है।



पिछले वित्तवर्ष के बेहतरीन नतीजों से सावधान रहें, इस बात का पता लगाएं कि प्रत्येक कंपनी पूरे सालभर और प्रत्येक तिमाही में कैसा प्रदर्शन कर रही है।



कंपनी की विविध देनदारियों की अवधि पर नजर रखें।

वित्तीय वर्ष के लेखांकन नीतियों में बदलाव पर नजर रखें।

यदि खातों के लिए कोई महत्वपूर्ण सूचना है तो इस पर ध्यान दें।

यदि ऑडिटर द्वारा कोई महत्वपूर्ण सुझाव है तो इस पर ध्यान दें।

बैलेंस शीट में क्या देखना जरूरी है?

फिक्सड एसेट, निवेश, कर्ज और उधारियां

किन प्रमुख वित्तीय मापदंडों या संबंधों पर ध्यान रखना चाहिए?

शेयर प्रति आय (ईपीएस)



ईपीएस के जरिए कंपनी के प्रत्येक शेयरों से आय की जानकारी हासिल होती है। इसकी गणना कंपनी की शुद्ध आय को शेयरों की संख्या में विभाजित कर की जाती है।



निम्न ईपीएस की तुलना में उच्च स्तर का ईपीएस बेहतर होता है, जिसका मतलब है कि निवेशकों के पास मौजूद शेयरों से उनको अच्छी आय होनेवाली है।



निवेशकों को केवल वर्तमान ईपीएस पर नजर न रखते हुए भविष्य के अनुमानित ईपीएस पर भी नजर रखनी चाहिए ताकि उनको पता चल सके कि भविष्य में कंपनी के शेयरों किसप्रकार की आय हासिल होगी।



मूल्य आय अनुपात (पी/ई)



आप जिस अनुपात का उल्लेख ज्यादा देखेंगे वो मूल्य आय अनुपात से अलग अनुपात होगा लेकिन मूल्य आय अनुपात को प्रायः पी/ई के रूप में दर्शाया जाता है।



पी/ई  के जरिए कंपनी के महंगे या सस्ते होने का पता चलता है। इसकी गणना कंपनी के शेयर कीमतों को ईपीएस से विभाजित कर की जाती है। नियमों के अनुसार, उच्च स्तर वाली पी/ई का मतलब है कि कंपनी की आय में तेज बढ़ोतरी हो रही है लेकिन यदि एक समान सेक्टर की अन्य कंपनियों के साथ पी/ई  की तुलना की जाती है और पी/ई ज्यादा है तो इसका तात्पर्य है कि कंपनी के शेयरों का मूल्यांकन ज्यादा है।
इस अनुपात से किसी भी कारोबार की अन्य के कारोबार के साथ तुलना की जा सकती है। इस अनुपात से निवेशक सही मायने में कंपनियों की तुलना एक समान सेक्टर की कंपनियों या पूरे बाजार के पी/ई  के मुकाबले तुलना कर सकते हैं।



निवेशकों को केवल बीते वर्ष की आय पर आधारित पी/ई पर नजर नहीं रखनी चाहिए बल्कि भविष्य के अनुमानित पी/ई और प्रस्तावित पी/ई  पर भी नजर रखनी चाहिए। इससे निवेशकों को भविष्य में कंपनी की आय में कैसी बढ़ोतरी रहेगी इसका अंदाजा लग जाता है, इसके अलावा कंपनी के शेयरों में खरीदारी फायदेमंद है या नहीं इस बात का भी पता चल जाता है।



पीईजी अनुपात



यदि आप अच्छी आय वाली कंपनियों में निवेश कर रहे हैं तो कंपनी के पीईजी अनुपात पर नजर रखना बहुत जरूरी है। यह अनुपात कंपनी के पी/ई के साथ कंपनी की वृद्धि दर भी दर्शाता है। इसकी गणना प्रस्तावित पी/ई अनुपात को प्रस्तावित ईपीएस वृद्धि को विभाजित कर की जाती है। पीईजी अनुपात का निम्न रहना दर्शाता है कि कंपनी के शेयर अच्छे हैं।



पूंजी पर रिटर्न



इस अनुपात से निवेशकों को कंपनी की संपत्ति बनाने की तेजी का अंदाजा लग जाता है। इसकी गणना शुद्ध मुनाफे के आंकड़े को कंपनी द्वारा लगाई गई पूंजी के साथ विभाजित कर हासिल की जाती है।



पूंजी पर हासिल हुए ज्यादा रिटर्न का मतलब है कि कंपनी कामयाबी के साथ आगे बढ़ रही है।



एबिटा और ईवी



एबिटा, मुनाफे का प्रमुख अनुपात है जोकि ब्याज, कर, विमूल्यन और ऋणमुक्ति के पहले हासिल हुई आय को दर्शाता है। इसका उपयोग कंपनी के परिचालित मुनाफे की क्षमता को दर्शाने के लिए होता है।



आप इस अनुपात का उपयोग ऐसी कंपनी के विश्लेषण में कर सकते हैं, जो बड़े पैमाने में अपने कारोबार में पुनर्निवेश करती है, इसके लिए एंटरप्राइस वैल्यू को एबिटा के साथ विभाजित किया जाता है।



नकदी प्रवाह कैसा है?

क्या यह निगेटिव है?

लाभांश कैसा रहा है?

आईपीओ के लिए इसका कोई मतलब नहीं होता है।

सूचीबद्ध समूह कंपनी के मामले में शेयरधारकों के प्रति प्रमोटर की जिम्मेदारी क्या होती है?



लाभांश योजना



बोनस इश्यू, राइट्स इश्यू, समूह कंपनियों की डिलिस्टिंग, पूर्व की पब्लिक इश्यू कीमतें तय करना

समूह कंपनियों का प्रदर्शन कैसा रहा है?

कितने वर्षों से कारोबार में मौजूद हैं

कंपनियों की संख्या, वृद्धि दर, बाजार हिस्सेदारी और बढ़ोतरी, वित्तीय स्थिति

संबंधित पार्टी के साथ लेनदेन कितना महत्वपूर्ण है?

क्या यह पारिवारिक कारोबार है?

क्या समूह कंपनियां मुख्य ग्राहकों की सूची बनाते हैं?

क्या अधिकांश कच्चे माल की पूर्ति समूह कंपनियों से होती है?

संबंधित कंपनी से वित्तीय लेनदेन का विस्तार

क्या समूह कंपनियों के बीच कोई विवाद चल रहा है?

क्या समूह कंपनियां बनाकर भी कंपनियों का कारोबार एक ही जैसा है?

निदेशक मंडल में कौन है?

परिवार का स्वामित्व या निदेशक मंडल आधारित

स्वतंत्र निदेशक

अनुभवी और बेहतरीन मुख्य निदेशक

कार्पोरेट गवर्नेंस पर लिस्टिंग समझौते की धारा 49 का अनुपालन

कंपनी के उत्पाद एवं सेवाएं क्या हैं?

पुरानी अर्थव्यवस्था या नई अर्थव्यवस्था?

नए तरीके के उत्पाद

सीजन आधारित उत्पाद

कारोबार में उतार-चढ़ाव पर आधारित उत्पाद

बाजार नजरिए पर निर्भर उत्पाद

कंपनी की तकनीक पर ज्यादा ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है

ग्राहकों के लिए क्या खास है?

एक या कई ग्राहकों पर निर्भरता है?

बहुत सारे तय कीमतों के ऑर्डर, लंबी अवधि के ठेके?

इश्यू की साइज क्या है?

बड़े पैमाने पर जारी होनेवाले इश्यू से बेहतर आवंटन के साथ बेहतर लिक्विडिटी सुनिश्चित होती है।

इश्यू के बाद सार्वजनिक पैसों का क्या होगा?

यह बहुत ही कठिन है क्योंकि सार्वजनिक पैसों से ही लिक्विडिटी निश्चित होती है।

इश्यू के बाद प्रमोटरों की हिस्सेदारी कितनी होगी?

इश्यू के बाद छोटे पैमाने पर हिस्सेदारी बेचने से ज्यादा विश्वास नहीं बन पाता है।

क्या कीमतें सही हैं?

'पार',  'प्रीमियम' जैसे मानकों को आधार मत बनाएं।



इश्यू प्राइस की कीमतों को सही तरीके से मापने के लिए यह देखें कि पी/ई की हाल के ईपीएस के साथ गणना की गई है या पिछले 2-3 वर्षों के औसतन ईपीएस के साथ।



इस श्रेणी की अन्य कंपनियों की कीमतों पर नजर डालें लेकिन पूरी तरह इसी पर निर्भर न रहें।


इंडस्ट्री लो/औसत/पी/ई की ऊंची कीमतें आदि भ्रामक स्थितियां निर्माण करती हैं; एक ही प्रकार की दो कंपनियां नहीं हो सकती हैं, सभी की अलग-अलग नीतियां हैं।



पूंजी निर्माण की योजनाएं कैसी रही हैं?

इसके पूर्व कोई सार्वजननिक निर्गम/राइट्स इश्यू/विदेशी इश्यू/प्रेफरेंशियल इश्यू जारी किए हैं।


 किसे, कब और कीमतें क्या थी?

क्या इसमें कोई वेंचर कैपिटल/प्राइवेट इक्विटी फंड इन्वेस्टमेंट कंपनी का समावेश है?

किसने, कब, किस कीमत पर और कितनी हिस्सेदारी के लिए निवेश किया हुआ है?

इन फर्मों को आवंटन करते समय ऑफर प्राइस के कीमतों की तुलना को किसप्रकार आंका गया था?
क्या ये फंड ऑफर में पूरी तरह बने हैं या कम हिस्सा बचा है?

कम हिस्से की निकासी या ऑफर से न निकलने से बेहतर स्थिति बन जाती है; वेंचर कैपिटल ऊंची कीमतों पर बाहर निकलने की फिराक में रहते हैं। 2004-05 में एनडीटीवी और यूटीवी से वेंचर कैपिटल ने अपनी आंशिक हिस्सेदारी बेच दी थी।

इश्यू के उद्देश्य क्या हैं?

नई परियोजना के लिए फाइनेंस?

विस्तार योजना

पूंजीगत निवेश की बढ़ोतरी

कर्ज का पुनर्भुगतान?

अधिग्रहण

सब्सिडियरी को पूंजी सहायता

शाखाओं का विस्तार

सामान्य कार्पोरेट उद्देश्यों के लिए

प्रमोटरों या अन्य की निकासी (हिस्सेदारी बेचने के लिए ऑफर); कंपनी में पूंजी प्रवाह की कमी?

परियोजना लागत के घटक क्या हैं?

परियोजना लागत के घटकों में क्या कोई विषमता है?
एक समान दो कंपनियों की परियोजनाओं के लागत की तुलना करना कठिन है क्योंकि ऐसा बहुत कम होता है कि एक जैसी दो परियोजनाएं अमल में आ जाएं।

वर्तमान क्षमता का उपयोग कैसे हो रहा है?

क्या वर्तमान क्षमता का पूरी तरह या आंशिक तौर पर उपयोग हो रहा है?

कंपनी इश्यू के उद्देश्यों को फाइनेंस कैसे कर रही है?

क्या वर्तमान इश्यू के जरिए पूरी लागत के खर्च का भुगतान किया जाएगा?

क्या कंपनी प्रोजेक्ट के लिए कुछ पूंजी अपनी ओर से भी लगाएगी?

क्या किसी अन्य योजना के लिए पूंजी की जरूरत है?
यदि किसी योजना के लिए पूंजी की जरूरत है तो ठीक है लेकिन इसमें किसी गंभीर समस्या का समावेश नहीं होना चाहिए।

क्या उनकी भविष्य में पूंजी जुटाने की योजना है?

इस योजना के चलते आपकी आय पर असर पड़ सकता है।

इश्यू से जुटाई गई पूंजी का उपयोग कितने वर्षों तक होगा?

क्या इसे तुरंत ही उपयोग में लाया जाएगा या इसे अगले 2-3-4 वर्षों तक उपयोग किया जाएगा? यदि अधिकांशतः इसका उपयोग बाद में किया जाएगा, तो सवाल उठता है कि फिर अभी पैसे जुटाने की क्या जरूरत पड़ गई? पूंजी से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल देर से किए जाने पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।