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किस आईपीओ में पैसा लगाएं

प्रकाशित Sun, 17, 2010 पर 17:51  |  स्रोत : Hindi.in.com

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एक के बाद एक आ रहे आईपीओ में निवेशकों की दिलस्पी बढ़ने लगी है। लोटस नोएलवेल्थ के सीईओ, अशोक कुमार बता रहे हैं कि कैसे तय करें कि आईपीओ में पैसा लगाया जाए कि नहीं।


कंपनियां आईपीओ क्यों लाती है?



ज्यादातर कंपनियां पूंजी जुटाने के लिए आईपीओ लाती हैं। चाहे सरकारी हिस्सेदारी बेच रही हो या फिर बैंक या कंपनी आईपीओ ला रही हो, सबके पीछे पैसे इकट्ठा करने का मकसद होता है।



आईपीओ की समीक्षा करते वक्त जरूरी है कि जाना जाए कि कंपनी क्यों पूंजी जुटाना चाहती है। कंपनी बाजार की मजबूती को भुनाने के लिए ही इश्यू ला सकती है। ऐसे आईपीओ से दूर रहना ही निवेशकों के लिए बेहतर होगा। लेकिन, अगर कंपनी विस्तार योजनाओं के लिए या नई इकाइयां शुरू करने के लिए पैसा इकट्ठा कर रही हो, तो निवेशक कंपनी के इश्यू में पैसा लगा सकते हैं।


पब्लिक ऑफरिंग और आईपीओ में क्या अंतर है?



आईपीओ का मतलब होता है इनिशियल पब्लिक ऑफर, जिसमें कंपनी पहली बार हिस्सेदारी बेच रही होती है। जो कंपनिया पहले से ही लिस्टेड हैं, उनके इश्यू को पब्लिक ऑफरिंग कहा जाता है।


फिक्स्ड प्राइस आईपीओ और बुक बिल्ट इश्यू में क्या अंतर है?



बुक बिल्ड आईपीओ में इश्यू के लिए प्राइस बैंड तय किया जाता है और निवेशकों से आवेदन मंगवाए जाते हैं। जिस कीमत पर कंपनी को सबसे ज्यादा आईपीओ के लिए आवेदन मिलते हैं, उस कीमत पर शेयर का भाव तय किया जाता है।



फिक्स्ड प्राइस इश्यू में शेयर की कीमत पहले से ही तय होती है। निवेशकों को तय करना होता है कि वो पैसा लगाना चाहते हैं या नहीं।



1997 में ह्यू सॉफ्टवेयर ने पहली बार बुक बिल्ट आईपीओ बाजार में उतारा था। बाद में, सभी कंपनियों को बुक बिल्ट इश्यू ही पसंद आ रहा है। देखा गया है कि बैंकों के फिक्स्ड प्राइस आईपीओ को अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। रिटेल निवेशकों को आकर्षित करने के लिए फिक्स्ड प्राइस इश्यू अच्छा विकल्प है। लेकिन, अगर कंपनी चाहती है कि संस्थागत निवेशक इश्यू में पैसा लगाएं, तो बुक बिल्ट इश्यू बेहतर है।  


क्या शेयर की कीमत तय करने का बुक बिल्ट अच्छा तरीका है?



बुक बिल्ट से शेयर की कीमत तय करना कंपनी के लिए बेहतर है। लेकिन, रिटेल निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। ज्यादातर रिटेल निवेशक कट-ऑफ प्राइस पर आवेदन करते हैं। मतलब, कंपनी द्वारा तय की गई कीमत पर शेयर दिए जाएंगे। ऐसे में निवेशकों को शेयर के लिए अनुमान से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।

वहीं, फिक्स्ड प्राइस इश्यू में निवेशक को कीमत की जानकारी पहले से ही होती है। जिसके आधार पर निवेशक फैसला ले सकते हैं।


क्या बुक बिल्ट इश्यू रिटेल निवेशकों के लिए सही है?



रिटेल निवेशकों और संस्थागत निवेशकों का एक ही मकसद होता है- मुनाफा कमाना। अगर रिटेल निवेशक फायदा चाहते हैं, तो उन्हें नुकसान उठाने की भी तैयारी रखनी चाहिए।



लेकिन, रिटेल निवेशकों को आवेदन के वक्त पूरी रकम जमा करनी पड़ती है। तो आईपीओ के लिए आवेदन करने से पहले रिटेल निवेशकों को पैसा इकट्ठा करना पड़ता है, जो हर कोई नहीं कर पाता। संस्थागत निवेशकों के लिए ऐसी पाबंदी नहीं है।


शेयरों के आवंटन न होने पर रिटर्न कब मिलेगा?



शेयरों के आवंटन न होने पर निवेशकों को 21 दिन में रिटर्न मिल जाता है।


कैसे तय करें की आईपीओ में पैसा लगाएं कि नहीं?



आईपीओ में निवेश करने से पहले कंपनी और सेक्टर के पिछले कुछ सालों के प्रदर्शन की जांच-परख करना जरूरी है। कंपनी द्वारा जारी किए आंकड़ों से ही फैसला न लें। देखें कि दूसरी कंपनियों के मुकाबले कंपनी का प्रदर्शन कैसा रहा है।


क्या सेक्टर की दूसरी कंपनियों के मुकाबले आईपीओ सस्ता रखना चाहिए?



किसी भी कंपनी को आईपीओ की कीमत सेक्टर की बाकी कंपनियों से कम रखनी चाहिए। अगर कीमत दूसरी कंपनियों के शेयरों के बराबर रखी जाएगी, तो निवेशक आईपीओ में पैसा लगाने की बजाय दूसरी कंपनियों में पैसा लगाना पसंद करेंगे।


कंपनी के किन आंकड़ों पर ध्यान देना चाहिए?



डेट-इक्विटी रेश्यो से पता चल सकता है कि कंपनी पर कुल कितना कर्ज है। साथ ही, ऑपरेटिंग मार्जिन से कंपनी के मुनाफे के बारे में जाना जा सकता है। इसके अलावा कंपनी के मैनेजमेंट को भी जानना जरूरी है।



सेबी के निर्देश के मुताबिक आईपीओ लाने वाली सभी कंपनियों पिछले सालों के आंकड़ें, प्रोमोटरों की जानकारी मुहैया कराना जरूरी है। रिटेल निवेशकों इश्यू के प्रॉस्पेक्ट्स से सारी जानकारी मिल सकती है।


आईपीओ पर सेबी की क्या भूमिका रही है?



सेबी ने आईपीओ बाजार में पारदर्शिता लाने के लिए कई कड़े कदम उठाएं हैं। प्रॉस्पेक्ट्स में कंपनी की सारी जानकारी करना जरूरी हो गया है। कंपनी के आईपीओ लाने की घोषणा के बाद सेबी कंपनी की जांच-पड़ताल करती है।



लेकिन, सेबी नहीं बता सकती है कि किस आईपीओ में पैसा लगा जाए। सेबी का काम सिर्फ रिटेल निवेशकों के हित की रक्षा है। पैसा लगाने या न लगाने का फैसला तो रिटेल निवेशकों को ही करना है।