आवाज अड्डाः सुनवाई शुरू, क्या तीन तलाक पर लगेगी रोक! -
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आवाज अड्डाः सुनवाई शुरू, क्या तीन तलाक पर लगेगी रोक!

प्रकाशित Thu, 11, 2017 पर 20:57  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सुप्रीम कोर्ट के पंच परमेश्वरों ने तीन तलाक के मुद्दे पर सुनवाई शुरू कर दी है। इस विवादित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने जो संविधान पीठ बनाई है, उसमें पांच अलग-अलग धर्मों के जज शामिल हैं। इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जेएस खेहर कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ये तय करेगा कि तीन तलाक धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मौलिक अधिकार के दायरे में आता है या नहीं।


तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं की लड़ाई अपने मुकाम पर पहुंचती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट में आज इस मामले की सुनवाई शुरू हो गई है। कोर्ट ने तय कर लिया है कि वो किस पहलू पर विचार करेगा और किस पर नहीं।


सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि वो फिलहाल सिर्फ तीन तलाक पर विचार करेगा। एक से ज्यादा शादी के मामले में सुनवाई नहीं होगी। कोर्ट ये तय करेगा कि क्या तीन तलाक इस्लाम की मूल भावना में शामिल है। कोर्ट ने साफ किया है कि अगर वो इस सवाल का जवाब हां में हुआ तो फिर हम दखल नहीं देंगे।


मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नुमाइंदगी के वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी है कि तीन तलाक आस्था से जुड़ा मामला है। और ये न्यायिक समीक्षा के परे है। वहीं सरकार ने तर्क दिया है कि तीन तलाक असंवैधानिक और महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है। उधर मुस्लिम महिलाओं ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें इंसाफ मिलेगा।


सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक के मसले पर अगले 10 दिनों तक सुनवाई चलेगी। ये लड़ाई आम मुस्लिम महिलाओं के हक और कट्टरपंथी सोच के बीच की है। सवाल ये है कि संविधान में मिले मौलिक अधिकार और अपना धर्म मामने की आजादी में तकरार हो तो बड़ा कौन है।


वहीं केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक बार फिर से कहा है कि तीन तलाक का मुद्दा औरतों के सम्मान से है और सरकार मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाना चाहती है।


वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने का स्वागत किया है। बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट कोई ऐसा फैसला नहीं करेगा जो बिल्कुल नई और उसके पहले के फैसले से अलग हो।


ऐसा नहीं है कि ट्रिपल तलाक का मामला पहली बार सामने आया हो इससे पहले भी उत्तराखंड की सायरा बानो को उसके पति ने शादी के 10 साल बाद मायके में चिट्ठी लिख कर तलाक दे दिया था। चिट्ठी में सिर्फ तीन बार तलाक तलाक तलाक लिखा था। सायरा ने गुजारा भत्ता के बजाए तलाक की वैधता को चुनौती दी। इसके अलावा उसने एक से ज्यादा शादी और हलाला को भी चुनौती दी। इसके लिए सायरा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।


सायरा की तरह ही इंदौर की शाहबानो को 1978 में उनके पति ने तलाक दिया था। हालांकि शाहबानो ने ट्रिपल तलाक को चुनौती ना देते हुए गुजारा भत्ता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया था। तब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने विरोध किया था। ट्रिपल तलाक पर राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम बनाया गया था। जिसके तहत उस नए कानून में पति गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से मुक्त करार किया गया था। तब राजीव सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया गया था।


तीन तलाक पर केंद्र सरकार ने विरोध करते हुए तीन तलाक को महिलाओं से लैंगिक भेदभाव करार दिया है। सरकार का कहना है कि महिलाओं को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता और पर्सनल लॉ के आधार पर महिलाओं से उनका हक नहीं छीन सकते है। सरकार के मुताबिक महिलाओं की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता है।


आपको बता दें कि सऊदी अरब, पाकिस्तान, इराक, इजिप्ट, जॉर्डन, कुवैत, सूडान, सीरिया, यूएई, यमन जैसे मुस्लिम देशों नें तीन तलाक प्रथा खत्म कर दी है। बीएमएमए के 2015 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक 90 फीसदी मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक और एक से ज्यादा शादी से मुक्ति चाहती हैं।