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आवाज अड्डाः ईवीएम पर महाभारत, धांधली के आरोपों में कितना है दम!

प्रकाशित Wed, 15, 2017 पर 20:52  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

क्या विपक्ष का मनोबल इतना टूट गया है कि अब 5 राज्यों के चुनाव नतीजों के लिए ईवीएम पर भी सवाल उठाने लगे है। बीएसपी की सुप्रमो मायावती के बाद अब आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने भी चौकाने वाले आरोप लगाये है। केजरीवाल का कहना है कि आप के पंजाब में मिलें वोटों में से 20 से 25 फीसदी शिरोमणी अकाली दल को चले गए और इसलिए पंजाब में आप जीत नही पाई। क्या इन आरोपों में दम है या फिर चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद कुछ पार्टियां बहाने ढूंढ रही है।


5 राज्यों में चुनाव के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर विवाद है कि थमने का नाम नहीं ले रहा है। बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर बीजेपी पर ईवीएम में गड़बड़ी करके चुनाव जीतने का आरोप लगाया है। मायावती ने इस मुद्दे को कोर्ट में ले जाने और आंदोलन करने का इरादा जताया है। केजरीवाल का यहां तक कहना है कि ईवीएम में गड़बड़ी के साफ सबूत हैं और कई बूथों पर वोट से ज्यादा कार्यकर्ता मिले है।


मायावती और केजरीवाल के बयानों को बीजेपी ने हार की हताशा बताया है। वहीं कांग्रेस भी नसीहत दे रही है कि हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ना ठीक नहीं है।


कांग्रेस औपचारिक तौर पर आज ईवीएम पर उठे सवाल से बच रही है। लेकिन मंगलवार को ही कांग्रेस नेता अजय माकन ने जब कई लोग  ईवीएम पर संदेह जता रहे हैं तो एमसीडी चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाने चाहिए।


इन सभी के आरोपों का खडन करते हुए चुनाव आयोग का कहना है कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित और भरोसेमंद हैं। हालांकि अब तक अलग-अलग कोर्ट में ईवीएम पर सवाल उठाये गये थे और अदालतों ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर मोहर लगाई है। साल 2000 से ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है और आयोग को इसमें गड़बड़ी की शिकायत नहीं मिली है।


राजनैतिक पार्टियों द्वारा ईवीएम मशीन पर लगाए जा रहे आरोपों का खंडन करते हुए चुनाव आयोग की दलील है कि ईवीएम में ना इंटरनेट है और ना किसी तरह के सर्वर से कनेक्ट किया जाता है। जिसके चलते इसकी ऑनलाइन हैकिंग नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि वोटिंग शुरू होने से पहले ईवीएम की टेस्टिंग होती है। मॉक पोलिंग में सभी पोलिंग एजेंट से वोट डलवाए जाते हैं और एजेंट देखते हैं कि उनके उम्मीदवार के पक्ष में वोट डल रहे हैं। इसके बाद पोलिंग एजेंट ईवीएम ही होने का सर्टिफिकेट प्रभारी को देते हैं। मॉक पोलिंग के बाद ही वोटिंग शुरू की जाती है। हर पोलिंग बूथ में वोटरों की डिटेल रजिस्टर में लिखी जाती है और ईवीएम के वोटों का मिलान रजिस्टर से किया जाता है।


ऐसा नहीं है कि ईवीएम की गड़बड़ियों पर पहली बार सवाल उठाये जा रहे है। साल 2009 में लोकसभा चुनावों में हार के बाद बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे। आडवाणी ने परंपरागत मतपत्रों की वापसी की मांग की थी। वहीं डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के नाम पर जी वी एल नरसिम्हा राव ने ईवीएम की गड़बड़ी पर किताब लिखी है जिसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी। इस किताब में ईवीएम से धोखाधड़ी पर विस्तार से चर्चा की है।


भारत में ईवीएम मशीन के सफर की बात करें तो सन 1998 में पहली बार इसका इस्तेमाल किया गया था। जिसे 16 विधानसभा क्षेत्रों में शुरु किया गया। इतना ही नहीं 1999 में लोकसभा चुनाव में कुछ सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था। जिसके बाद 2004 से सभी चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है। एक ईवीएम में 3840 वोट दर्ज हो सकते हैं।


बता दें कि ईवीएम मशीन को अन्य देशों में बैन किया गया है। नीदरलैंड में पारदर्शिता में कमी के चलते ईवीएम मशीन को बैन किया गया हैं। वहीं 3 साल के रिसर्च के बाद आयरलैंड में भी इसे बैन कर दिया गया। ईवीएम को असंवैधानिक बताते हुए जर्मनी सहित इटली और अमेरिका के कई राज्यों में इसे बैन कर दिया गया हैं।


सवाल है कि जब कोई पार्टी हारती है, क्या तभी ईवीएम में गड़बड़ी नजर आती है। क्या ये हारने वाली पार्टियों के लिए महज बहाना बन चुका है। क्या आरोपों को देखते हुए जांच की जरूरत है।