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आवाज अड्डाः पटाखा बिक्री पर रोक, कम होगा प्रदूषण!

प्रकाशित Wed, 11, 2017 पर 20:46  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पटाखा बैन पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब आरएसएस खुलकर सामने आ गया है। संघ ने फैसले पर पुनर्विचार और बीच का रास्ता निकालने की मांग की है। संघ ने त्रिपुरा के गवर्नर तथागत रॉय के उस बयान का भी समर्थन किया है जिसमें कहा गया है कि कल को प्रदूषण के नाम पर हिंदुओं के चिता जलाने पर रोक की मांग उठ सकती है। यानि अब प्रदूषण की बजाय सीधा-सीधा धार्मिक भेदभाव का मामला बनाया जा रहा है।


दिवाली पर पटाखे बैन नहीं हुए, सिर्फ बिक्री बैन हुई है। लेकिन सोशल मीडिया पर एक तबका इसे हिंदुओं के त्यौहार में दखलअंदाजी मान कर इसका खुला विरोध कर रहा है। इनका तर्क है कि बकरीद में कुर्बानी पर रोक नहीं, क्रिसमस, न्यू ईयर पर पटाखा बैन नहीं तो फिर दिवाली ही क्यों? इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए त्रिपुरा के गवर्नर तथागत रॉय ने भविष्य में हिंदुओं के लिए एक बड़ा दिखाया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि
कल को प्रदूषण का हवाला देकर मोमबत्ती जलाने और हिंदुओं की चिता जलाने पर भी बैन लगाने की मांग की जा सकती है।


आरएसएस ने ना सिर्फ तथागत रॉय के विचार का समर्थन किया है, बल्कि प्रदूषण को ईद और क्रिसमस से जोड़ते हुए फैसले को भेदभाव करने वाला बताया है और मांग की है कि कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए और बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए।


वहीं कांग्रेस मानती है कि कोर्ट के फैसले पर सवाल तो उठाए जा सकते हैं लेकिन इसे धर्म के नजरिए से देखना ओछी राजनीति है।


दूसरी तरफ सर्दियों में दिल्ली में प्रदूषण और बीमारियों को देखते हुए बहुत बड़ा तबका पटाखा बैन के फैसले का स्वागत कर रहा है, जिसमें सरकार की सहयोगी पार्टियां भी शामिल हैं।


बता दें कि साल 2016 में डब्ल्यूएचओ के सर्वे रिपोर्ट में दिल्ली शहर को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया था। एयर क्वालिटी इंडेक्स सामान्य से 7 गुणा खतरनाक है। पिछले साल दिवाली के बाद खतरनाक प्रदूषण हवा में खुले थे जिसके चलते स्कूल, कॉलेज बंद करने पड़े थे। 2016 में नवंबर में पटाखों के लाइसेंस रद्द किए गए थे।


जानकारों के मुताबिक पटाखों से प्रदूषण का खतरा अधिक बढ़ जाता है क्योंकि पटाखों में प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है। इससे ना केवल ध्वनि से प्रदूषण होता है बल्कि इनसे होने वाले कंपन और आवाज तथा विस्फोट के दौरान निकलने वाले जहरीले कण से प्रदूषण पैदा होते है। इतना ही नहीं पोटैशियम कॉर्बोनेट, सल्फाइड से भी प्रदूषण पैदा होता है जिससे मिट्टी, हवा, पानी, ध्वनि में प्रदूषण की मात्रा अधिक बढ़ जाती है।


हालांकि इतिहास के आईने से आतिशबाजी को देखा जाएं तो पटाखों का इतिहास 2000 साल से पुराना रहा है।  भारत में 16वीं शताब्दी में पटाखों का जिक्र किया गया था। तब बांस में ब्लैक पाउडर भरकर पटाखे बनाए जाते थे। उन दिनों शाही दरबार में मनोरंजन और शादी, बड़े समारोहों में आतिशबाजी का चलन था। 16वीं, 17वीं शताब्दी की पेंटिंग में आतिशबाजी देखने को मिलती है। औरंगजेब ने दिवाली में पटाखों पर बैन लगाया था क्योंकि उन दिनों औरंगजेब पटाखों को हिंदुओं का चलन मानते थे। औरंगजेब के बाद एक बार फिर पटाखे चलन में आए और पटाखों की पहली फैक्ट्री कलकता में लगाई गई।


सवाल उठता है कि क्या कोर्ट का फैसला वाकई धर्म के मामले में दखलअंदाजी है और इसमें हिंदू धर्म के प्रति भेदभाव झलकता है? सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ दिवाली पर बैन लगाने से दिल्ली को प्रदूषण से मुक्ति मिल जाएगी? और क्या प्रदूषण के खतरे को देखते हुए पटाखों पर हमेशा के लिए बैन लगा देना चाहिए?