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बढ़ेंगे घर खरीदार के अधिकार, नियमों में होगा बदलाव

प्रकाशित Tue, 14, 2017 पर 18:49  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

महाराष्ट्र सरकार ने दिसंबर में रियल एस्टेट रेगुलेटर के लिए ड्राफ्ट नियम जारी किए थे। लेकिन कुछ नियम डेवलपर्स के ज्यादा फायदे में थे और ग्राहकों के हित में कम, यही कारण था कि ग्राहकों की तरफ से इन नियमों का जोरदार विरोध किया गया था। सीएनबीसी-आवाज़ ने भी हफ्ते भर से ज्यादा मुहिम चला कर घर खरीदारों को इसके बारे में जागरुक किया था। और, अब महाराष्ट्र सरकार रेरा यानि रियल एस्टेट रेगुलेटर के नियमों में बदलाव के लिए तैयार हो गई है। इसी हफ्ते नए नियमों को मंजूरी मिल सकती है क्योंकि 1 मई से राज्य में रियल एस्टेट रेगुलेटर काम करना शुरू कर देगा। तो क्या थी ड्राफ्ट बिल में वो कमियां और क्या हो रहे हैं बदलाव, क्या होने वाले बदलाव पर्याप्त होंगे या कुछ और गुंजाइश बाकी रहेगी। इन सब पर बात करने के लिए सीएनबीसी-आवाज़ के साथ जुड़ा वो पैनल जिसके साथ ये मुहिम चलाई थी।


गौरतलब है कि महाराष्ट्र के रियल एस्टेट रेगुलेटर के नियमों में बदलाव किया जाएगा। दरअसल ड्राफ्ट बिल में कई नियम बिल्डरों के पक्ष में थे और इसका भारी विरोध हुआ था। अब, सरकार ने दिए गए सुझावों में से कई मान लिए हैं और सरकार नियमों में बदलाव के लिए तैयार हो गई है। रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट भी रियल एस्टेट रेगुलेटर के दायरे में आएंगे। बता दें कि 1 मई से महाराष्ट्र में रियल एस्टेट रेगुलेटर अथॉरिटी लागू होगा।


महाराष्ट्र में रियल एस्टेट रेगुलेटर अथॉरिटी के तहत टर्मिनेशन नियम में बदलाव किया जाएगा। बिल्डर आसानी से डील रद्द नहीं कर सकेगा और 3 डिफॉल्ट करने के बाद ही नोटिस संभव होगा। घर खरीदार को नोटिस के बाद भी 15 दिन का वक्त दिया जाएगा, जबकि ड्राफ्ट नियम में सिर्फ 1 हफ्ते का वक्त दिया गया था। रियल एस्टेट रेगुलेटर के डिस्क्लोजर नियमों में भी बदलाव किया जाएगा। बिल्डर को रेगुलेटर की वेबसाइट पर सभी जरूरी जानकारी देनी होगी। पिछले 3 साल के काम का ब्यौरा देना होगा। बिल्डर को प्रोजेक्ट से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करनी होगी और हर साल अपनी बैलेंसशीट भी सार्वजनिक करनी होगी।


पहले बनाए गए रियल एस्टेट रेगुलेटर अथॉरिटी के नियमों में बिल्डर का ट्रैक रिकॉर्ड जाहिर करने करने का कोई प्रस्ताव नहीं था। जमीन के टाइटल, एनकंबरेंस सर्टिफिकेट, अपार्टमेंट सर्टिफिकेट, अपार्टमेंट का कार्पेट एरिया, प्रोजेक्ट का प्रस्तावि प्लान, प्रोजेक्ट का पास हुआ प्लान, प्रोजेक्ट में दी जाने वाली सुविधाएं, प्रोजेक्ट में इस्तेमाल एफएसआई का विवरण, सेल्स एग्रीमेंट और कनवेंस डीड, प्रस्तावित बिल्डिंग और फ्लोर की संख्या, ओपन स्पेस का एरिया, ओपन पार्किंग की संख्या और कंस्ट्रक्शन के तकनीक से जुड़ी जानकारियां उजागर करने को लेकर कोई प्रस्ताव शामिल नहीं था।


यही नहीं महाराष्ट्र के रेरा कानून में केंद्रीय रेरा कानून की अहम बातें भी शामिल नहीं की गई थी। महाराष्ट्र के रेरा कानून में सेक्शन 4(2) और नियम 3(2) की अहम बातें गायब थीं। जमीन के टाइटल को लेकर नियम कमजोर थे और टाइटल डिटेल साइट पर डालना अनिवार्य नहीं था। टाइटल के लिए किसी तरह की गाइडलाइन नहीं थी। टाइटल क्लियरेंस की क्वालिटी पर कोई नजर नहीं डाला गया था।


बता दें कि महाराष्ट्र में रेगुलेटर की अपनी वेबसाइट होगी और इस पर बिल्डर को अपना प्रोजेक्ट रजिस्टर करना होगा। वेबसाइट पर प्रोजेक्ट की जानकारी देनी होगी। प्रोजेक्ट के लिए 70 फीसदी पैसा एस्क्रो अकाउंट में डालना होगा और एस्क्रो अकाउंट से पैसे निकालने के अलग नियम होंगे। इसके लिए आर्किटेक्ट, इंजीनियर और सीए का सर्टिफिकेट लगेगा। साथ ही ब्रोकर भी रेगुलेटर के दायरे में आएंगे और शिकायत के लिए अपेलेट ट्रिब्यूनल बनेगा। लेट पेमेंट या पजेशन पर एक जैसा ब्याज देना होगा।


बिल्डर को जमीन के बारे में पूरी जानकारी देनी होगी। पार्किंग स्पेस का पूरा ब्यौरा देना होगा और अतिरिक्त एफएसआई इस्तेमाल की जानकारी भी देनी होगी। इसके साथ ही अभी बन रहे प्रोजेक्ट भी रेगुलेटर के दायरे में आएंगे। बिना ओसी वाले सभी प्रोजेक्ट रेगुलेटर के दायरे में आएंगे। मौजूदा प्रोजेक्ट के लिए 70 फीसदी अलग अकाउंट में रखना होगा।