Moneycontrol » समाचार » बाज़ार खबरें

आवाज़ अड्डा: चीन से रिश्ता, कितना करें भरोसा!

प्रकाशित Wed, 06, 2017 पर 10:24  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

मोदी-जिनपिंग मुलाकात और ब्रिक्स के घोषणापत्र में बिना नाम लिए पाकिस्तान की निंदा में भारत-चीन रिश्तों के भविष्य का बीज हो सकता है। लेकिन चीन के साथ हमारे संबंध इतने सरल नहीं रहे हैं। इतिहास को छोड़ भी दें तो डोकलाम में जमी बर्फ पिघलने में ढाई महीने लग गए। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार होता है, लेकिन संतुलन चीन के पक्ष में है। हम एक्सपोर्ट से ज्यादा इंपोर्ट करते हैं। चीन हमसे पांच गुणा ज्यादा बड़ी इकोनॉमी है। लेकिन भारत-अमेरिका रिश्तों की गर्माहट चीन को बर्दाश्त नहीं होती। वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों में चीन और भारत ज्यादातर आमने-सामने ही नजर आते हैं। भारत को चिढ़ाने और अपने हित साधने के लिए चीन, पाकिस्तान का इस्तेमाल भी करता है। ऐसे में हर बात को नफा-नुकसान के लिहाज से तौलना जरूरी है। अड्डा में आज इसी पर बात होगी, लेकिन उससे पहले देख लेते हैं कि ब्रिक्स सम्मेलन और जिनपिंग से मुलाकात में भारत को क्या हासिल हुआ।


एक घंटे से ज्यादा चली मोदी-जिनपिंग मुलाकात का निचोड़ - चीन और भारत आपसी रिश्तों की डगर पर आगे बढ़ेंगे, लेकिन उसकी पहली शर्त होगी, बॉर्डर एरिया में शांति और सद्भावना। आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए काम होगा। दो ताकतवर पड़ोसियों के बीच कभी विवाद हो जाना स्वाभाविक है, लेकिन उसे मिलकर सुलझाया जाएगा। दोनों सेनाओं के लोग संपर्क और सहयोग बढाएंगे और कोशिश करेंगे कि डोकलाम जैसी स्थितियां ना पैदा हों।


इससे पहले ब्रिक्स के घोषणापत्र में नाम लिए बगैर पाकिस्तान को निशाने पर लिया गया। कहा गया कि अफगानिस्तान में आईएस, अलकायदा, तालिबान, जैश और लश्कर जैसे आतंकवादियों की हिंसा निंदनीय है। ध्यान रहे कि लश्कर, जैश जैसे संगठनों को पाकिस्तानी सेना का सीधा समर्थन है। यूएन में जैश के सरगना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करवाने के प्रयास पर चीन ने वीटो कर दिया था। उसी जैश की निंदा करनेवाले ब्रिक्स के घोषणापत्र को इस बार चीन ने मंजूरी दी। सरकार इसे बड़ी जीत बता रही है।


सवाल उठता है कि क्या 73 दिन तनाव देने वाले डोकलाम में शांति बहाली को हम भारत की कूटनीतिक कामयाबी माने या आर्थिक हित साधने के लिए चीन ने फिलहाल कदम खींच लिए? क्या अब, कम से कम आतंकवाद पर चीन पाकिस्तान को शह देना बंद कर देगा? और सबसे बड़ा सवाल कि इतिहास को देखते हुए चीन की बातों पर कितना भरोसा किया जा सकता है!