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रेरा के बाद प्रॉपर्टी बाजार में क्यों आई सुस्ती!

प्रकाशित Fri, 06, 2018 पर 16:54  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

रेरा के आने के बाद माना जा रहा था कि प्रॉपर्टी बाजार में पारदर्शिता आएगी, घर खरीदारों का बाजार पर भरोसा बढ़ेगा और वो घर खरीदने में दिलचस्पी दिखाएंगे। लेकिन फिलहाल जमीनी हकीकत कुछ और ही है। घर खरीदार अभी भी परेशान हैं और मकान खरीदने से कतरा रहे हैं जिसकी वजह से बाजार में बिना बिके मकानों की संख्या काफी बढ़ गई है।


रेरा को प्रॉपर्टी बाजार की तस्वीर बदलने वाला कानून माना जा रहा था। अमल के एक साल बाद बाजार में बदलाव तो दिख रहे हैं लेकिन इन्हें काफी नहीं कहा जा सकता। मसलन कई शहरों में छोटे और अस्थायी बिल्डरों ने बड़ी कंपनियों को या तो अपने प्रोजेक्ट बेच दिए हैं या फिर उनके साथ ज्वाइंट वेंचर कर लिया है। ये माना जा रहा था कि रेरा आने के बाद घर खरीदारों का भरोसा बढ़ेगा और बिक्री में तेजी दिख सकती है। हालांकि देश के कुछ हिस्सों में बिक्री में बढ़त आई है लेकिन उसका असल कारण है अफोर्डेबल हाउसिंग को बढ़वा और ज्यादातर मकान उसी सेगमेंट में खरीदे जा रहे हैं। दूसरी तरफ देश में बिना बिके मकानों का स्टॉक भी लगातार बढ़ा है।


एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर, पुणे, चेन्नई और हैदराबाद समेत 7 बड़े शहरों में करीब साढे 4 लाख मकान बिना बिके पड़े हैं। इनमें से सबसे आगे है दिल्ली-एनसीआर जहां करीब 1.5 लाख घर खरीदारों का इंतजार कर रहे हैं।


बिक्री सुस्त है इसलिए बिल्डर भी नए लॉन्च से थोड़ा कतरा रहे हैं। जो लॉन्च हो भी रहे हैं उनमें से ज्यादातर अफोर्डेबल हाउसिंग में हैं। दूसरी तरफ खुद को रेरा के मुताबिक बनाने में भी बिल्डरों की रफ्तार काफी सुस्त है और इससे भी उनके लॉन्च लेट हो रहे हैं। हालांकि नोटबंदी, जीएसटी और रेरा ने मिलकर प्रॉपर्टी के भाव में जरूर थोड़ी नरमी ला दी है और पिछले साल के मुकाबले कीमतें 3 से 5 फीसदी तक कम हुई हैं।


रियल एस्टेट कंसल्टेंट नाइट फ्रैंक के मुताबिक प्रॉपर्टी की कीमतें पिछले साल मुबई में 5 फीसदी तो पुणे में 3 फीसदी घटीं। लेकिन बावजूद इसके घर खरीददारों का भरोसा डवलेपर्स पर वापिस नहीं लौटा है। बीते एक साल में दिल्ली एनसीआर बंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में घर खरीदारों की संख्या 6 से 26 फीसदी तक कमी आई है।


बड़े शहरों को छोड़ दें तो छोटे शहरों में बिल्डर और बायर दोनों में रेरा को लेकर जानकारी का अभाव दिखता है। कुछ राज्यों की हालत तो ये है कि वहां पर रेरा की शुरुआत ही नहीं हुई है। ऐसे में 1 मई को रेरा 1 साल का हो जाएगा लेकिन अभी इसे अपने पांव जमाने के लिए और वक्त लगेगा।