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आवाज़ अड्डा: अयोध्या मुद्दे पर बंट गए शिया और सुन्नी!

प्रकाशित Sat, 12, 2017 पर 17:07  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अदालत की नजर से देखें तो अयोध्या में ज़मीन के एक टुकड़े पर मिल्कियत का मुकदमा चल रहा है। अयोध्या यानी वो ज़मीन जहां युद्ध नहीं होता। लेकिन इसी अयोध्या की इस जमीन का झगड़ा शायद भारत के इतिहास के सबसे लंबे और सबसे गंभीर शीतयुद्ध का कारण है। आज़ादी के पहले से चल रही लंबी कानूनी लड़ाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट इस विवाद पर फैसला दे चुका है जिसमें विवादित जमीन के बंटवारे की बात कही गई है। लेकिन मामले से दो प्रमुख पक्षों रामलला के कस्टोडियन अखिल भारतीय हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को ये फैसला मंजूर नहीं है। इसलिए मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, सुनवाई की अगली तारीख 5 दिसंबर तय हुई है। अब सवाल ये है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा फैसला करेगा, जिसे सब मान लेंगे या फिर आपसी बातचीत से हल निकलेगा। लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि मामले में कई और पक्ष भी हैं जो या तो कोर्ट में या फिर बाहर अपने-अपने तरीके से असर डालने की कोशिश कर रहे हैं। इसी पर चर्चा होगी लेकिन उससे पहले एक नजर कोर्ट केस की ताजा स्थिति पर।


अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। कोर्ट ने तमाम पक्षों से कहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले, साक्ष्यों और गवाही से जुड़े कागजात पूरी तरह तैयार कर 5 दिसंबर को जुटें और तब मामला आगे बढ़ेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2010 में विवादित जगह के मालिकाना हक से संबंधित 4 मामलों में फैसला सुनाते हुए तीन पक्षों रामलला के प्रतिनिधि हिंदू महा सभा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के बीच विवादित जमीन के बराबर-बराबर तीन टुकड़े बांटने के आदेश दिए। उसी साल दिसंबर में हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने ये कहते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी कि कोई भी पक्ष जमीन का बंटवारा नहीं चाहता है। उम्मीद है कि दिसंबर से मामले पर तेज सुनवाई शुरू होगी। इस बीच शिया वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविड दायर कर कहा है कि विवादित जमीन से हटकर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद निर्माण का आदेश दिया जाए ताकि सौहार्द बना रहे है। शिया बोर्ड 1989 से ही मामले का एक लगभग न्यूट्रल पक्ष रहा है। ऐसे में बोर्ड के नए रुख ने कम से कम कोर्ट के बाहर एक पक्ष को मजबूती दे दी है तो मुस्लिम पक्षकारों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है।