Moneycontrol » समाचार » राजनीति

आवाज़ अड्डाः नरेश अग्रवाल की जरूरत क्यों, कहां गया बीजेपी का दावा!

प्रकाशित Tue, 13, 2018 पर 20:39  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

नरेश अग्रवाल की बीजेपी में एंट्री कोई अनोखी राजनीतिक घटना नहीं है। ना हीं ये पहली बार है कि मोदी-अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी ने किसी घुर विरोधी या दागी व्यक्ति को अपनाया है। एनडीए से निकलकर संघ मुक्त भारत की जंग छेड़ने वाले नीतीश कुमार भी एक बार फिर एनडीए की शोभा बढ़ा रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट में तो आयातित नेताओं के दम पर कई सरकारें बना दी गईं। डी पी यादव और बाबू भाई कुशवाहा जैसे नेताओं को लेकर इतना विरोध हुआ था कि उन्हें पार्टी से हटाना पड़ा। रही राजनीतिक शुचिता और विचार या सिद्धांत की बात, तो भारत की राजनीति में उस पर बहस भी जारी रहती है और आया राम गया राम के सहारे काम भी चलता रहता है। लेकिन रम और राम का घालमेल करने वाले अग्रवाल पर खुद बीजेपी के कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसी भी क्या मजबूरी थी?


समाजवादी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो रहे नरेश अग्रवाल का स्वागत करते पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा सोशल मीडिया पर अग्रवाल को टार्गेट कर आग उगलते रहे हैं। और ऐसा करने वालों में संबित के अलावा बीजेपी ही नहीं संघ के लोग भी शामिल रहे हैं। संघ से जुड़े राकेश सिन्हा ने तो अग्रवाल के पाकिस्तान से रिश्तों की जांच एनआईए और रॉ से कराने की मांग भी की थी। लेकिन जैसे विवाद के लिए नरेश अग्रवाल और बीजेपी नेताओं के पुराने बयान काफी नहीं हों, अग्रवाल ने पार्टी में शामिल होने की घोषणा करते हुए जया बच्चन पर ऐसी बात बोल दी कि वो एक बार फिर नए सिरे से सबके निशाने पर आ गए। बीजेपी की दिग्गज महिला नेता सुषमा स्वराज, स्मृति इरानी, रूपा गांगुली से लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के सहयोगी दलों ने एक सुर से इस बयान की निंदा शुरू कर दी।


चौतरफा निंदा के बाद नरेश अग्रवाल ने अपने शब्द वापस लेते हुए खेद प्रकट किया है। और अब वो अपने तमाम पुराने बयानों को भी याद नहीं करना चाहते जो  बीजेपी समर्थकों के चिढ़ने की वजह बन सकते हैं। 


लेकिन संसद में हंसने के लिए प्रधानमंत्री का निशाना बन चुकी कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी नरेश अग्रवाल के बयान और दल बदल को  बीजेपी की संस्कृति का पतन बता रही हैं।


नरेश अग्रवाल पहले दल और विचार की पल्टी मारकर बीजेपी में आए हैं। इसलिए सवाल उठता है कि क्या अब बीजेपी सिर्फ मोदी के चेहरे पर चल रही है और अब अलग चाल, चरित्र वाली छवि जरूरी नहीं है? क्या नरेश अग्रवाल जैसे नेताओं के शामिल होने से आम पार्टी कार्यकर्ताओं में रोष नहीं होगा? और सबसे बड़ा सवाल क्या राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता जैसी चीजें बहुत पहले बेमानी हो चुकी हैं?