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आवाज अड्डाः रिलीज से पहले गरमाया पद्मावती विवाद, कितना जायज!

प्रकाशित Thu, 09, 2017 पर 20:55  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

भारत दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, जहां अलग-अलग भाषाओं में साल भर में लगभग 1 हजार फिल्में बनती हैं। अब इसमें दो-चार फिल्मों को लेकर विवाद हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे विवादों पर चर्चा को समय की बर्बादी भी कहा जा सकता है। लेकिन जब सत्ताधारी पार्टी से जुड़े नेता विवाद में कूद पड़ें और एसोचैम जैसा संगठन बीच-बचाव की जरूरत बताने लगे तो ये मानना पड़ता है कि विवाद पर विराम लगना जरूरी है। आवाज अड्डा में हम बात करेंगे संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती पर उठे विवाद की।


संजय लीला भंसाली की पद्मावती शूटिंग शुरु होने से पहले ही विवाद में आ गई थी। फिल्म पर सबसे तीखा विरोध कर रहे करनी सेना और राजपूत सभा जैसे संगठनों ने शूटिंग के दौरान संजय लीला भंसाली के साथ मारपीट की और सेट में आग तक लगा दी। तमाम विरोध के बीच फिल्म बनकर तैयार है, ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है और 1 दिसंबर को फिल्म की रिलीज तय की गई है। लेकिन विरोध करने वाले अब मांग कर रहे हैं कि रिलीज से पहले फिल्म दिखाई जाए नहीं तो वो रिलीज को बाधित करेंगे। विरोधियों की कमान अब जयपुर राजघराने की बेटी और बीजेपी एमएए दीया सिंह ने थाम ली है।


दीया सिंह की तरह मध्य प्रदेश के एक बीजेपी विधायक ने भी फिल्म का कड़ा विरोध किया है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और उमा भारती ने भी पद्मावती को इतिहास, महिला सम्मान और धर्म से जोड़ते हुए फिल्म का विरोध किया है। आपत्ति का आधार ये है कि फिल्म में चित्तौड़ की महारानी पद्मावती और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच अंतरंग दृश्य है। जबकि फिल्म के निर्माता-निर्देश भंसाली ने बार-बार कहा है कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है और राजपूत स्वाभिमान का पूरा ख्याल रखा गया है।


मुख्यधारा के इतिहास में अल्लाउद्दीन खिलजी ने 1303 इस्वी में चित्तौड़ पर फतह हासिल करने का वर्णन है लेकिन इसमें पद्मावती का कोई जिक्र नहीं है। 16000 महिलाओं के साथ पद्मावती के जौहर और खिलजी के आक्रमण की चर्चा दंतकथाओं का हिस्सा है, जिसका सबसे बड़ा आधार है, 16वीं सदी के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पदमावत। फिल्म भी इसी रचना से प्रेरित बताई जाती है। लेकिन संजय लीला भंसाली की सफाई के बावजूद हो रहे विवादों के बाद सवाल उठता है कि क्या ऐतिहासिक कहानियों पर आधारित फिल्में ही नहीं बनानी चाहिए?